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  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    वो  होता  नहीं  हमारा क्यों, रुठा किस्मत का तारा क्यों! आते नहीं एक दिन मिलने, फिर करते हो इशारा क्यों! हम  दोनो का इक दूजे बिन, अब होता नहीं गुजारा क्यों! चांदनी  बिन  चांद को तुमने,...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    चारों और अंधेरा देखा दूर  बहुत सवेरा देखा! मज़बूरों का फुटपाथों पे, मैने  रेन- बसेरा देखा! बिखरे सब परिवार मिले, तेरा  देखा,  मेरा देखा! ससंद  के  गलियारों में, मक्कारों का डेरा देखा! ऐरे-गेरे जितने भी मिले,...

  • गीत

    गीत

    मेरी विधा से इतर एक प्रयास,,,,,,, दिन के बाद रात का आना ये सच है, ये अटल भी है, तेरे इसी आज में शामिल, आने वाला कल भी है, हकीकत पर जीवन की रुककर कुछ विचार...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    कौन मुर्दा, कौन जिंदा है, यहां पर, कौन कितना नेक बंदा है, यहाँ पर! छीन ली इज्जत ये, किसने नारियों की, आजकल इंसा दरिंदा है, यहाँ पर! मन के काले, तन के उजले हैं सभी अब,...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    दर्द के आसपास,, रहने दे, थोडा दिल को उदास,, रहने दे! कोई क़ातिल नहीं तुम्हारे सिवा, बेसबब ये तलाश,, रहने दे! अपने हिस्से में तीरगी ही सही, उनके हिस्से उजास, रहने दे! छोड़ दो कल पे...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    हादसों, किस्मतों के ये मारे, हुए, रुप फिर भी थे अपने संवारे, हुए! एक अरसा हुआ ज़िंदगी में यहां, वक्त हमको भी अच्छा गुज़ारे, हुए! हैं फकीरों से सब उसके दर पे यहां, हाथ सबके मिले...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    आज से सबकी किस्मत पढ़ी जाएगी यूं कहें सबकी नीयत पढ़ी जाएगी टूटेगें सब भरम किसमेो कितना है दम आजमाऐंगे हिम्मत पढ़ी जाएगी तेरी सूरत से अब तेरी सीरत है क्या पहचानेंगे फितरत पढ़ी जाएगी कोई भरपेट है, कोई...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    यहां हम डूबने को तैयार, बैठे हैं, वो साहिल पर लिये पतवार, बैठे हैं! हमारे दिल में क्या है कैसे कहें उनसे, जो अब तक लब पे ले इंकार, बैठे हैं! चलो सहरद है क्या तुमको...

  • गीत : ये कविता मेरी है

    गीत : ये कविता मेरी है

    श्वेत, धवल, उजले आंगन पर मैने, इक कलम कुछ स्याही लेकर, अन्तर्मन के अंतर्द्वंद की भावनाऐं उकेरी है, फिर भी कैसे कह दूं लोगो ये कविता मेरी है! दो शब्द मां ने लिखवाऐ, दो अक्षर मेरे...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    कांटों मे या गुलाब,, में लिख, नाम दिल की किताब, में लिख! इतने सारे सवाल मेरे हैं, एक ख़त तो ज़वाब, में लिख! मज़िल या कोई ठिकाना मिले, किनारे नहीं दोआब, में लिख! वो चांद भी...