गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हाथ अपने उठा के बैठा हूं, रब से अर्जी लगा के बैठा हूं। नींद उनको कहीं न लग जाए, ख़्वाब सारे जगा के बैठा हूं। दर्द दिल का कहीं न पढले वो, इसलिए मुस्करा के बैठा हूं। आजमाना न तिश्नगी मेरी, मैं समुंदर सुखा के बैठा हूं। जितनी तूने कमाई जीवन भर, उतनी तो मैं […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

इश्क से बढ़कर ज़माने में दुआ कुछ भी नहीं। इश्क़ मज़हब,इश्क़ ही रब, है खुदा कुछ भी नहीं। रोज़ ख़्वाबों में मुलाकातें हमारी हो रही, मत कहो कि अब हमारा राबता कुछ भी नहीं। मौत की हर दिन लड़ाई लड रहा हूं ज़िंदगी, आगे इसके तेरा मुझसे सामना कुछ भी नहीं। जी रहे हो ज़िंदगी […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ले कितनी दूर जाओगे अब तिश्नगी रख दो, अपने से थोड़ी दूर अपनी बेबसी रख दो‌। जीने के लिए सांसों का सौदा करें चलो, चंद सांसें ही सांसों के लिए पेशगी रख दो। कब तक ये सितारे फ़लक पे तन्हा रहेगें, इस शब में इनके साथ चांद, चांदनी रख दो। कल रात मेरे पास आके […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

क्या नयी है, क्या पुरानी आखिरी है, ये तेरा किस्सा, कहानी आखिरी है। जान जिसने दी वतन के वास्ते, अब नहीं है, ये जवानी आखिरी है। अपनी ताकत पे न कर झूठा गुमां, एक ताकत आसमानी आखिरी है। तू भले खातों में रख अपना हिसाब, जोड़ रब का मुंहजबानी आखिरी है। शर्मों, हया के बांध […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बेसबब दीपक जलाया धूप में, और सितारों को बुलाया धूप में। दिन उजाले छोड़कर सोता रहा, रात आई और जगाया धूप में। कैसा नकली ये ज़माना हो गया, कुछ कहा और कुछ दिखाया धूप में। इश्क़ भी झुलसा हुआ जैसा लगे, फिर किसी ने दिल लगाया धूप मे सिर्फ बेटा इसलिए नाराज़ है, बाप ने […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कागज़, कलम, सियाही है, रचना की अगुआई है। वो जो हवा में उड़ता है, जुमला सिर्फ हवाई है। बहुत खुशी का है मौका, ग़ज़ल, गीत से ब्याही है। गीत जो आग लगाते थे, अब तो राख उड़ाई है। इतना ही सब लिखते हैं, जिसमें खूब कमाई है। लिखना नहीं है,बिकना है, कहां बची कविताई है। […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सामने आके मेरे खड़ा है तो क्या, एक बेकार ज़िद पे अडा है तो क्या‌। देखलो मुझको मैं भी हूं छोटा नहीं, वो अगर थोड़ा मुझसे बड़ा है तो क्या। झूठ फिर भी नहीं वो कहेगा कभी, आइना लाख हीरों जड़ा है तो क्या। अंत में कट के गिरना ही किस्मत तेरी, तू पतंगों सा […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

यूं चारों सिम्त नफरत हो गई है, मुहब्बत की ज़रूरत हो गई है। कभी जो दोस्त थे उनसे मुझे अब, न जाने क्यूं अदावत हो गई है। मुझे मां- बाप हिस्से में मिलें हैं, मेरी असली वसीयत हो गई है। पलटकर देखना और मुस्कुराना, यूं लगता है के चाहत हो गई है। किसी भी दाम […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

रोज़ मेरे सपनों में आया करता है, नींदों में वो घर बनाया करता है। ये कैसी फितरत है उसकी पूछो ना, हंसते- हंसते मुझे रुलाया करता है। इन वीरान, अंधेरी काली रातों में, आस का दीपक रोज़ जलाया करता है। वो बेटा दुनिया में नसीबों वाला जो, अपनी मां के चरण दबाया करता है। तन्हाई […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कभी अपने लिए कुछ शौक पाल जीना था, मौत का ज़िंदगी से डर निकाल जीना था। क्यूं अपने मन को मार इतने दिनों जीता रहा, क्या तुझको थी ये ख़बर कितने साल जीना था। बाद तेरे हो तेरी ‘जय’ मिसाल दुनिया में, जितना जीना था तुझे बेमिसाल जीना था। — जयकृष्ण चांडक ‘जय’