पद्य साहित्य हाइकु/सेदोका

भोर (40 हाइकु)

1. भोर होते ही हड़बड़ाके जागी, धूप आलसी। 2. आँखें मींचता भोरे-भोरे सूरज जगाने आया। 3. घूमता रहा सूरज निशाचर भोर में लौटा। 4. हाल पूछता खिड़की से झाँकता, भोर में सूर्य। 5. गप्प करने सूरज उतावला आता है भोरे। 6. छटा बिखेरा सतरंगी सूरज नदी के संग। 7. सुहानी भोर दीपक-सा जलता नन्हा सूरज। […]

पद्य साहित्य हाइकु/सेदोका

दुलारी होली

1. दे गया दग़ा रंगों का ये मौसम, मन है कोरा। 2. गुज़रा छू के कर अठखेलियाँ मौसमी-रंग। 3. होली आई मन ने दग़ा किया उसे भगाया। 4. दुलारी होली मेरे दुःख छुपाई देती बधाई। 5. सादा-सा मन होली से मिलकर बना रंगीला। 6. होलिका-दिन होलिका जल मरी कमाके पुण्य। 7. फगुआ मन जी में […]

सामाजिक

आधी दुनिया की पूरी बातें

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने 24 दिसम्बर 1914 को श्री गोपाल कृष्ण गोखले को एक पत्र लिखा था। पत्र में लिखा ”… ऐसा लगता है कि हमें भारत को उसकी बीमारी से मुक्त करने से पहले पुरुषों की एक नयी नस्ल की आवश्यकता है। हम मकसद को लेकर अधिक प्रतिबद्धता, भाषण में अधिक साहस और […]

कविता पद्य साहित्य

एक दिन मुक्ति के नाम

कभी अधिकार के लिए शुरु हुई लड़ाई हमारी ज़ात को ज़रा-सा हक़ दे गई बस एक दिन, राहत की साँसें भर लूँ ख़ूब गर्व से इठलाऊँ, ख़ूब तनकर चलूँ मेरा दिन है, आज बस मेरा ही दिन है पर रात से पहले, घर लौट आऊँ। बैनर, पोस्टर, हर जगह छा गई औरत लड़की बचाओ, लड़की […]

कथा साहित्य संस्मरण

छुप-छुप खड़े हो की मेरी लता

लता मंगेशकर का मतलब मेरे लिए है उनका गाया गीत ”चुप-चुप खड़े हो ज़रूर कोई बात है…।” यह गाना मेरी ज़बान पर चढ़ गया था और मैं अपने पापा को यह गाकर चिढ़ाती थी। मेरे पापा गाना सुनने के बहुत शौकीन थे; घर में एक रेडियो-रेकॉर्ड प्लेयर और ढेरों रेकॉर्ड थे। मेरे घर में दिनभर […]

पद्य साहित्य हाइकु/सेदोका

वसन्त पंचमी (वसन्त पंचमी पर 10 हाइकु)

1. पीली सरसों आया है ऋतुराज ख़ूब वो खिली। 2. ज्ञान की चाह है वसन्त पंचमी अर्चन करो। 3. पावस दिन ये वसन्त पंचमी शारदा आईं। 4. बदली ऋतु, काश! मन में छाती बसन्त ऋतु। 5. अब जो आओ ओ! ऋतुओं के राजा कहीं न जाओ। 6. वाग्देवी ने दीं परा-अपरा विद्या, हुए शिक्षित। 7. चुनरी […]

क्षणिका पद्य साहित्य

मरजीना (क्षणिका)

1. मरजीना *** मन का सागर दिन-ब-दिन और गहरा होता जा रहा दिल की सीपियों में क़ैद मरजीना बाहर आने को बेकल मैंने बिखेर दिया उन्हें कायनात के वरक़ पर। -0- 2. कुछ *** सब कुछ पाना    ये सब कुछ क्या?    धन दौलत, इश्क़ मोहब्बत    या कुछ और? जाने इस ‘कुछ’ का क्या अर्थ है। -0- 3. मौसम *** […]

कविता पद्य साहित्य

हाँ! मैं बुरी हूँ

मैं बुरी हूँ कुछ लोगों के लिए बुरी हूँ वे कहते हैं- मैं सदियों से मान्य रीति-रिवाजों का पालन नहीं करती मैं अपनी सोच से दुनिया समझती हूँ अपनी मनमर्ज़ी करती हूँ, बड़ी ज़िद्दी हूँ। हाँ! मैं बुरी हूँ मुझे हर मानव एक समान दिखता है चाहे वह शूद्र हो या ब्राह्मण चाहे वह हिन्दू […]

क्षणिका पद्य साहित्य

क्षणिकाएँ

1. नाज़ुक टहनी ******* हम सपने बीनते रहे जो टूटकर गिरे थे आसमान की शाखों से जिसे बुनकर हम ओढ़ा आए थे आसमान को कभी ज़रा-सी धूप हवा पानी के वास्ते, आसमान की नाज़ुक टहनी सँभाल न सकी थी मेरे सपनों को। _______________________ 2. हदबन्दी ******* मन की हदबन्दी, ख़ुद की मैंने जिस्म की हदबन्दी, ज़माने […]

कविता पद्य साहित्य

पापा

ख़ुशियों में रफ़्तार है इक सारे ग़म चलते रहे तुम्हारे जाने के बाद भी यह दुनिया चलती रही और हम चलते रहे जीवन का बहुत लम्बा सफ़र तय कर चुके एक उम्र में कई सदियों का सफ़र कर चुके अब मम्मी भी न रही तमाम पीड़ाओं से मुक्त हो गई तुमसे ज़रूर मिली होगी बिलख-बिलख […]