सामाजिक

नसीर के डर की वज़हें वाज़िब हैं, मैं भी डरी हुई हूँ

न जाने आज बहुत आलस सा लग रहा था। रोज़ की तरह 7 बजे उठकर नियमित क्रमानुसार सारे कार्य करने का मन भी नहीं हुआ। सब छोड़कर एक कप चाय के साथ एक हिन्दी अखबार लेकर पढने बैठी। अखबार में अधिकांशतः नकारात्मक खबरें होती हैं, मगर देश दुनिया की थोड़ी सकारात्मक खबरें भी मिल जाती हैं, जैसे कि कुछ नई […]

सामाजिक

औरत की आज़ादी का मतलब

‘हमें चाहिए आज़ादी’, ‘हम लेकर रहेंगे आज़ादी’, किसे नहीं चाहिए आज़ादी? हम सभी को चाहिए आज़ादी। सोचने की आज़ादी, बोलने की आज़ादी, विचार की आज़ादी, प्रथाओं से आज़ादी, परम्पराओं से आज़ादी, मान्यताओं से आज़ादी, काम में आज़ादी, हँसने की आज़ादी, रोने की आज़ादी, प्रेम करने के आज़ादी, जीने की आज़ादी…स्त्री के तौर पर जन्म लेने की […]

कविता पद्य साहित्य

पायदान…  

सीढ़ी की पहली पायदान हूँ मैं जिसपर चढ़कर समय ने छलाँग मारी और चढ़ गया आसमान पर मैं ठिठक कर तब से खड़ी काल चक्र को बदलते देख रही हूँ, कोई जिरह करना नहीं चाहती न कोई बात कहना चाहती हूँ न हक़ की न ईमान की न तब की न अब की। शायद यही प्रारब्ध […]

कविता पद्य साहित्य

महाशाप…

किसी ऋषि ने   जाने किस युग में   किस रोष में   दे दिया होगा सूरज को महाशाप नियमित, अनवरत, बेशर्त   जलते रहने का   दूसरों को उजाला देने का,   बेचारा सूरज   अवश्य होत होगा निढाल   थक कर बैठने का   करता होगा प्रयास   बिना जले   बस कुछ पल   बहुत चाहता होगा उसका मन,   पर शापमुक्त होने का उपाय   ऋषि से बताया न होगा,   युग सदी बीते, बदले   पर वह   फ़र्ज़ से नही भटका   न कभी अटका   हमें जीवन और   ज्योति दे रहा है   अपना शाप जी रहा है।   कभी-कभी किसी का शाप   दूसरों का जीवन होता है। […]

पद्य साहित्य हाइकु/सेदोका

कैसी ज़िन्दगी? (10 ताँका)

1. हाल बेहाल मन में है मलाल कैसी ज़िन्दगी? जहाँ धूप न छाँव न तो अपना गाँव! 2. ज़िन्दगी होती हरसिंगार फूल, रात खिलती सुबह झर जाती, ज़िन्दगी फूल होती!   3. बोझिल मन भीड़ भरा जंगल ज़िन्दगी गुम, है छटपटाहट सर्वत्र कोलाहल!   4.   दीवार गूँगी सारा भेद जानती, कैसे सुनाती? ज़िन्दगी है […]

राजनीति

बन्दूक-बन्दूक का खेल

नक्सलवाद और मजहबी आतंकवाद में सबसे बड़ा बुनियादी फ़र्क उनकी मंशा और कार्यकलाप में है। आतंकवादी संगठन हिंसा के द्वारा आतंक फैला कर सभी देशों की सरकार पर अपना वर्चस्व बनाये रखना चाहते हैं। इनकी मांग न तो सत्ता के लिए है न बुनियादी जरूरतों के लिए है।नौजवानों को गुमराह कर विश्व में एक ही मज़हब का […]

हाइकु/सेदोका

फ़ौजी-किसान  

1. कर्म पे डटा कभी नहीं थकता फ़ौजी-किसान! 2. किसान हारे ख़ुदकुशी करते, बेबस सारे! 3. सत्ता बेशर्म राजनीति करती, मरे किसान! 4. बिकता मोल पसीना अनमोल, भूखा किसान! 5. कोई न सुने किससे कहे हाल डरे किसान! 6. भूखा-लाचार उपजाता अनाज न्यारा किसान! 7. माटी का पूत माटी को सोना बना माटी में मिला! […]

कविता

मर गई गुड़िया..

गुड़ियों के साथ खेलती थी गुड़िया ता-ता थइया नाचती थी गुड़िया ता ले ग म, ता ले ग म गाती थी गुड़िया क ख ग घ पढ़ती थी गुड़िया तितली-सी उड़ती थी गुड़िया ! ना-ना ये नही है मेरी गुड़िया इसके तो पंख है नुचे कोमल चेहरे पर ज़ख़्म भरे सारे बदन से रक्त यूँ […]

पद्य साहित्य हाइकु/सेदोका

हमारी माटी (गाँव पर 20 हाइकु)

1. किरणें आई खेतों को यूँ जगाए जैसे हो माई। 2. सूरज जागा पेड़ पौधे मुस्काए खिलखिलाए। 3. झुलसा खेत उड़ गई चिरैया दाना न पानी। 4. दुआ माँगता थका हारा किसान नभ ताकता। 5. जादुई रूप चहूँ ओर बिखरा आँखों में भरो। 6. आसमाँ रोया खेतिहर किसान संग में रोए। 7. पेड़ हँसते बतियाते […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में

तन्हा रहे ताउम्र अपनों की भीड़ में एक घर तलाशते ग़ैरों की नीड़ में! वक्त के आइने में दिखा ये तमाशा ख़ुद को निहारा पर दिखे न भीड़ में! एक अनदेखी ज़ंजीर से बँधा है मन तड़पे है पर लहू रिसता नहीं पीर में! शानों शौक़त की लम्बी फ़ेहरिस्त है साँस-साँस क़र्ज़दार गिनती मगर अमीर […]