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  • “भरोसा” भाग 2

    “भरोसा” भाग 2

    डिनर टेबल पर ईशा खामोश बैठी मैन्यू देखने में व्यस्त थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था क्षितिज के साथ क्या बात करें और क्या नहीं। वह झिझक भी रही थी इसलिए स्वयँ को व्यस्त...

  • कोख की व्यथा

    कोख की व्यथा

    14 फरवरी 2019 घाटी में हुई ह्रदय विदारक आत्मघाती हमले में शहीद हुए जवानों को मेरी अश्रुपूरित आंखों से श्रद्धांजलि स्वरूप यह रचना… “कोख की व्यथा” पुनः शहीदों के रक्त से लाल हुई भारत मां की...

  • भरोसा भाग 1

    भरोसा भाग 1

    “नहीं, नहीं, नहीं क्षितिज अब और यह सब मुझसे नहीं होगा। अपने आप पर बहुत जुर्म कर लिया मैंने। तुम्हारी बातें मैंने बहुत मान ली। तुम्हारी बातें मानते मानते, मैंने अपने अंतर्मन को ही मार दिया।...

  • नारी

    नारी

    नारी युग युग से मैं शोषित जननी होकर भी, युग युग से मैं व्यथित पूजनीय होकर भी। मैं पूजी जाती हूं देवी के रूप में, शक्तिदायिनी के रूप में, कल्याणकारिणी के रूप में, देकर इतना सम्मान...

  • ऋतुराज

    ऋतुराज

    पुष्प सुसज्जित पूर्ण यौवना बाग वन वन टेसू खिले लगाए आग। इतराती प्रकृति सोलह श्रृंगार कर मोहित हो प्रेम रस बरसाए अंबर। पुष्प पुष्प पर डोले प्यासे मधुकर प्रेम गीत गाए मोहित हो भ्रमर। ले उड़े...

  • कदमों के निशां

    कदमों के निशां

    गाँँव हमीरपुर में आज उत्सव का माहौल है। सबके चेहरे पर खुशी का उन्माद छाया हुआ है। जिसे देखो वही, बच्चे, बूढ़े, जवान सभी दौड़ दौड़ के गाँँव के अस्पताल की ओर जा रहे हैं और...

  • उर्मिला की व्यथा

    उर्मिला की व्यथा

    अपने भ्राता राम जी के संग लक्ष्मण चौदह वर्ष के लिए वनवास गए। अपने नवविवाहिता पत्नी उर्मिला को वह संग लेकर नहीं जा पाए। लक्ष्मण के विरह में उर्मिला रात दिन कैसे जली, उस व्यथा को...

  • माटी का दीप

    माटी का दीप

    लालटेन कहे ‘माटी के दीप’ से बहुत छोटा है तेरा आकार, कैसे हटेगा तेरी ज्योति से अमावस का घनघोर अंधकार। छोटी सी कुटिया में रहकर बीत गया तेरा सारा जीवन, बुझ जाती है क्षण भर में...

  • वफादार कौन

    वफादार कौन

    आज सेठ रामदास की आंखों की कोरें भीगी हुई थीं। वह चाहकर भी अपने आंसुओं को रोक नहीं पा रहा था। आंसुओं को रोकने का प्रयास कर रहा था परंतु आंसू है कि रुकने का नाम...

  • मस्त कलंदर

    मस्त कलंदर

    आज गणतंत्र दिवस पर हमारे देश के जवानों को समर्पित मेरी रचना…. ” मस्त कलंदर ” चली ठंडी हवा जब हम घरों में दूबके सब सर से पांव तक रजाई,कंबल ओढ़कर। लगा सूरज पश्चिम ढलने ठिठुरन...