Author :

  • तुम वही हो क्या

    तुम वही हो क्या

    जिसको चाहा था तुम वही हो क्या? मेरी हमराह ज़िंदगी हो क्या? कल तो हिरनी बनी उछलती रही क्या हुआ आज थक गई हो क्या? ऐ बहारों की बोलती बुलबुल क्यों हुई मौन बंदिनी हो क्या?...

  • बेटी बचाएँ

    बेटी बचाएँ

    ज़मीं से उठाकर फ़लक पर बिठाएँ। अहम लक्ष्य हो, आज बेटी बचाएँ। जहाँ घर-चमन में, चहकती है बेटी बहा करतीं उस घर, महकती हवाएँ। क़तल बेटियाँ कर, जनम से ही पहले धरा को न खुद ही,...

  • परिणय के बाद

    परिणय के बाद

    मीरा ने ज्योंही रसोई का कचरा डालने के लिए घर के पिछवाड़े का द्वार खोला, सामने एक सुदर्शन युवक को उसी तरफ घूरता पाकर सकपका गई. उसने बिना इधर-उधर देखे जल्दी से ढेर पर कचरा डाला...

  • एक रोटी के लिये

    एक रोटी के लिये

    रात दिन जो एक करते, एक रोटी के लिए। आज वो ही जन तरसते, एक रोटी के लिए। अन्न दाता देश के ये, हल चलाते हैं सदा। फिर भी गिरवी खेत रखते, एक रोटी के लिए।...

  • सुनहरी भोर बागों में

    सुनहरी भोर बागों में

    सुनहरी भोर बागों में, बिछाती ओस की बूँदें! नयन का नूर होती हैं, नवेली ओस की बूँदें! चपल भँवरों की कलियों से, चुहल पर मुग्ध सी होतीं मिला सुर गुनगुनाती हैं, सलोनी ओस की बूँदें! चितेरा...

  • अधूरी मन्नत

    अधूरी मन्नत

    दमयंती की आँखों के सामने चाहे स्वच्छ अनंत आसमान था, मगर उसके मनस्पटल पर घोर काले बादल उमड़-घुमड़ मचा रहे थे. सहसा बिजली सी कौंधी और बादल बरसने लगे. उसका हाथ बरबस ही भीगे हुए गालों...

  • नीम की शीतल हवा

    नीम की शीतल हवा

    ग्रीष्म ऋतु में संगिनी सी, नीम की शीतल हवा। दोपहर में यामिनी सी, नीम की शीतल हवा। झौंसता वैसाख जब, आती अचानक झूमकर सब्ज़ वसना कामिनी सी, नीम की शीतल हवा। ख़ुशबुएँ बिखरा बनाती, खुशनुमाँ पर्यावरण...



  • नम हवा फुलवारियों की

    नम हवा फुलवारियों की

    नम हवा फुलवारियों की खूब भाती है मुझे। नित्य नव भावों भरी कविता सुनाती है मुझे। रात के आगोश में सुख स्वप्न गाते लोरियाँ प्रात प्यारी शबनमी, निस दिन जगाती है मुझे। लाल सूरज जब समंदर...