गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कोई राह मिलती नहीं है कहीं तक, जिंदगी की शाम अब ढलने लगी है। हर शख्स हैरान परेशान है दिखता, आईने को भी अब तो फुरसत नहीं है। दगाबाज चेहरों की रौनक तो देखो, वफा की किसी को जरूरत नहीं है। रिश्तों को ज़हरीली मुस्कानों ने घेरा, जज़्बातों की अब कोई कीमत नहीं है। काम […]

कहानी

कहानी – उम्मीद

देश में कोरोना की दूसरी लहर अत्यंत भयावह रूप धारण करती जा रही थी।डबल वेरिएंट वाला वायरस बड़ी निर्ममता व तेजी के साथ लोगों की जीवन लीला समाप्त कर रहा था।इस बार तो उसने बच्चों और युवाओं तक को अपना शिकार बनाने में कोई परहेज नहीं किया।प्रशासन का ढुलमुल रवैया और आम जनता की लापरवाही […]

कविता

चांद और प्रेयसी

व्योम के एक छोर से दूसरे छोर तक, धवल वस्त्र धारण किए, मुखमंडल पर उजास लिए, विचर रहा है तारों के साथ, शुक्ल पक्ष का तन्हा चांद। विरह वेदना से आहत, अनेक रेशमी स्मृतियों को समेटे, विचर रही है छत की मुंडेर पर, एक हताश,उदास तन्हा प्रेयसी। नील गगन का दूधिया चांद, भीड़ में लेकिन […]

कहानी

कहानी – उम्मीद

देश में कोरोना की दूसरी लहर अत्यंत भयावह रूप धारण करती जा रही थी।डबल वेरिएंट वाला वायरस बड़ी निर्ममता व तेजी के साथ लोगों की जीवन लीला समाप्त कर रहा था।इस बार तो उसने बच्चों और युवाओं तक को अपना शिकार बनाने में कोई परहेज नहीं किया।प्रशासन का ढुलमुल रवैया और आम जनता की लापरवाही […]

लघुकथा

चांद से वार्तालाप

कोरोना के बढ़ते प्रकोप से ज़िन्दगी की रफ्तार थम सी गई और लोग अपने घरों की चारदीवारी में कैद हो गए। मोहल्ले के अधिकांश लोग और मेरे घर के निचले हिस्से में रहने वाला परिवार भी इसकी चपेट में आ चुका था सो मेरा डरना स्वाभाविक था।बाहर तो दूर की बात थी मैंने तो नीचे […]

कविता

आखिर क्यों?

बहन, मां, बेटी हो तुम, पत्नी और प्रेयसी हो तुम। तुम ही गीता ,रामायण हो, तुम ही सृष्टि की तारण हो। कितने किरदारों में ढलती हो? फिर क्यों अबला बन फिरती हो तुम सुमन किसी फुलवारी की, तुम जननी किसी किलकारी की। आंचल में ममता की धार है, चुनौतियां भी सभी स्वीकार हैं। फिर क्यों […]

कविता

कड़वा सच (कविता)

छल, कपट, ईर्ष्या, अहम का गर्म बाज़ार है, छद्म वेश धारण किए दिखता हर इंसान है। मुंह पर मीठे बोल,भीतर ही भीतर घात है, कपटी लोगों की अजब गजब सी जात है। शतरंज का खेल खेलते बनते बड़े होशियार हैं, बेबस और लाचार को ठगते,कितने ये मक्कार हैं। तेरे मेरे बीच में जो ये खामोशी […]

कविता

आखिर कैसे?

दर्द के मंजर हर तरफ हैं यहां, ज़ख्मों को छिपा मैं मुस्कुराऊं कैसे? गर्दिश में आजकल हैं सितारे मेरे, हौसलों को नए पंख लगाऊं कैसे? चेहरे के ऊपर लगा रखे हैं कई चेहरे, फितरत किसी की मैं जान पाऊं कैसे? चंद सिक्कों में ईमान बिका करते हैं, कौन अपना?कौन पराया?बताऊं कैसे? ताउम्र दगाबाजी याद रहेगी […]

कविता

कविता – खुशबू तेरे प्यार की

अवचेतन हृदय व्योम पर, बिखरी है यत्र सर्वत्र, तुम्हारे प्रेम की सुरभि। सुरभि जिसमें समाहित है, अपनत्व का अथाह सौरभ। शब्दहीन मौन संवाद, विस्मृत कर देता है, समस्त पीड़ाओं और अवसादों को। प्रति क्षण रचता रहता है, एक अनावृत प्रेम अध्याय। प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए खींच ली जाती हैं कुछ रेखाएं जो संकुचित दायरे […]

कविता

विदाई

तुमसे विदा लेते समय, जो शब्द कहे थे मैंने, आहत कर गए थे मुझे भीतर तक। कितनी मुश्किल से बोल सकी थी, “अलविदा।’” जाने क्या-क्या टूट रहा था, मेरे अंतस में, मन और मस्तिष्क के अंतर्द्वंद से। आशाएं, धैर्य, व्याकुलता, सब पस्त हो गए थे इस कश्मकश में। आंसुओं का विशाल सागर, उमड़ पड़ा था […]