कविता

सावन के इंतज़ार में

सावन के इंतज़ार में वो अब खामोश होकर देख रही है गगन को जैसे अपना सब कुछ खो चुकी हो प्यार में। आंखों में उसकी अभी इक आस दिखती है जो ले आती है वहीं यहां छोड़ा था उसके बेबफा दिलदार ने। अब के सावन ने भी बहुत देर कर दी है पिछले साल की […]

कविता

व्यंग्य कविता।

अपने वजूद का जब भी सवाल होता है। वतन का फिर कहां उनको ख्याल होता है। खूब लूटा जिन्होने वतन को इतने सालों में; हार गए तो अब मंहगाई पर बवाल होता है। राजनीति ने जिन्हें कहीं का न छोड़ा फिर; भूगोल का पूछे कोई तो कैसे मलाल होता है। हर रोज़ बेतुकी बातें ट्विटर […]

कविता

हम न बदलेंगे…

मुस्कुराते हैं होंठ और सदा मुस्कुराते रहेंगे। तुम लाख कोशिश कर लो हम न बदलेंगे। कितनी ही बाधाएं आईं राहों में मगर देखो; हम मंज़िल की तलाश में यूंही बढ़ते रहेंगे। तुम लाख कोशिश……. वक्त बदला और बदले हालात देखते देखते; न छोड़ी राह सही और न ग़लत कभी सहेंगे। तुम लाख कोशिश…… अपने उसूलों […]

कविता

तुम लाख दगा करो हैं संस्कार तुम्हारे…

चोट जब स्वाभिमान पर लगती है तो, करारा जवाब फिर मिलता है। तुम लाख दगा करो हैं संस्कार तुम्हारे, पर इक दिन नकाब ये उतरता है। कौन हारा है गिनती के हथियारों से , इतिहास में देख लो फिर चाहे; इक जज़्बा जो उमड़ता है अपनों का, वीरों के हौसलों में वो दिखता है। तुम […]

कहानी

मन्नत

आफिस से घर आने की जल्दी में मन्नत ने शोर मचा रखा था…प्रियंका जल्दी चल, आज मुझे लड़के वाले देखने आ रहे हैं। प्रियंका ने भी शरारती भरे अंदाज़ में कहा… अच्छा बड़ी जल्दी है बेशर्म , थोड़ा सब्र है कि नहीं?? नहीं है , बस! सुना है अरविंद बहुत हैंडसम हैं, तू तो दूर […]

कविता

आंखों से कमाल करते हैं।

व्यंग्य कविता। बात होती जब वतन की वो सवाल करते हैं। खामोशी से कभी आंखों से कमाल करते हैं। तुम डरते हो बाहर के दुश्मनों से क्यों भला; वो भीतर छुप कर सरजमीं लाल करते हैं। हैं कुरितियां कितनी ही समाज में जो देखो तो; वो ढूंढ कर कुछ बातें रोकर मलाल करते हैं। जब […]

गीतिका/ग़ज़ल

कहना है मुझे।

सही को सही और ग़लत को ग़लत कहना है मुझे। ग़लत होते देख के यूं खामोश नहीं रहना है मुझे। कट्टरता नहीं अच्छी न ही कट्टर बनना है मुझे; सही को सही और ग़लत को ग़लत कहना है मुझे। सच नहीं छुपता कभी पल भर की आंधियों में; आएगा सामने ऐसा उनसे बस कहना है […]

गीतिका/ग़ज़ल

सिसक रहे हम छुप छुप कर।

सिसक रहे हम छुप छुप कर मगर तुम्हें कहें कैसे। जो अभाव रहा उम्रभर वो सफ़र तुम्हें कहें कैसे। तुम न समझोगे वो तन्हाई यादों की वो शहनाई; अश्क आंखों में भर कर वो सहर तुम्हें कहें कैसे। खफ़ा होकर चले जाना और फिर लौट के न आना; तुम्हारी जुस्तजू रही सदा वो असर तुम्हें […]

कविता

लाॅकडाउन।

लाॅकडाउन नहीं ये साथी, जीवन बचाने का प्रण है। यहां युद्ध नहीं कोई लड़ना, ये न कोई ऐसा वैसा बंधन है। जागो समझो और बस , छोटी सी शुरुआत करो। जो सेवा अपनी दे रहे , उनका करना अभिनंदन है। सबको मिलकर लड़ना होगा, इस संकट से उभरना होगा। प्रधानमंत्री के इस फैसले पे सबको […]

बाल कविता

मुझे समझाना तुम।

मां सुन सुन के ये समाचार मुझे डर लगता है, तुम हो मेरे पास फिर भी मुझे डर लगता है। पापा सब का ध्यान हैं रखते देखो अस्पताल में, उनके पास बेझिझक जाऊं कैसे मुझे डर लगता है। आज के हालात देख याद स्कूल की बात आई, साफ सफाई का महत्त्व बताती टीचर याद आई। […]