गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

क़ाफिया-आना रदीफ़- कहीं मिला नहीं जहाँ में अभी ठिकाना कहीं! तुम हमें न यूं बार -बार आज़माना कहीं! मेरे मुकद्दर में नहीं लिखा तेरे सिवा कोई, ये बात फुर्सत में खुद को भी समझाना कहीं! ये जो गैरों से मिलकर हमें देखते हो छुप कर, आता है सब समझ हमको न बहलाना कहीं! हमसे बिछड़ने […]

कविता

दीवारें भी सुनती हैं…

दीवारें भी सुनती हैं शायद जो भी बात घटती है घर में, कभी जब छोटी सी बात कलह बन जाती है घर में! महसूस करती हैं घर की नींव की तरह जिस पर टिकता आशियाना, होगा बंटवारा या मिलजुल कर रहेंगे और गूंजेगा तराना! सहम जाती हैं और देती हैं धूप- छाँव का अहसास भी, […]

गीत/नवगीत

आयी चुनाव की बेला…(व्यंग्य रचना)

आओ देखो तुम ये राजनीति का खेला, क्योंकि दोस्तों अब आयी चुनाव की बेला। इक दूजे पे तीर चले हैं यूं भारी भरकम, मुफ़्त की सेल लगी है कहीं लगा है मेला, क्योंकि दोस्तों अब आयी चुनाव की बेला। देशहित के कानून हों चाहे कोई सुझाव, भीड़ पीछे है कहीं रह गया हंसा अकेला। क्योंकि […]

गीत/नवगीत

तरकश..

तरकश.. तरकश में वो तीर कहां अब, जो दुश्मन को ख़ामोश करें। आओ हम तुम मिलकर अब कुछ तो प्रयास रोज़ करें। दुश्मन है वो बहुत पुराना,रोज़ जाल नया वो बिछाएगा , अजगर का फन कुचलने को आओ आज ही उदघोष करें। तरकश में अब ….. प्यार समझोते की भाषा उसको समझ न फिर आनी […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल !

बेरुखी ऐसी भी न हो चिलमन भी हो और तन्हाई भी मिले, हम फूलों की चाह करें और चमन में बस यूं कांटे ही मिले। तुम ही कह दो कैसे न शिक़वा हम करें तुम्हारी बेवफाई का, वादा भी तोड़ो और इल्ज़ाम जुदाई का आखिर हमें ही मिले। आईने को देख कर गुरूर इतना क्यों […]

गीतिका/ग़ज़ल

रुख़सत।

जो हो गए यूं रुख़सत उनकी कमी बाकी है, बदल गया थोड़ा आसमां पर ज़मीं बाकी है। उनका यूं वक़्त से पहले ऐसे चले जाना भी, होंठों पे है मुस्कान आंखों में नमी बाकी है। मुकद्दर से मिलते हैं रिश्ते कुछ खास कहीं, होते हैं संग अपने तो यादों की गुदगुदी बाकी है। वक़्त से […]

गीतिका/ग़ज़ल

वतन की शान देखो।

वतन की शान देखो जब बढ़ने लगी थी, सिर्फ निंदा आतंक पे न रहने लगी थी। लहु देख शहीदों का आंख उठने लगी थी, वतन की गरिमा अब महत्व पाने लगी थी। क्यों स्वार्थ में लिप्त विरोधी सब एक हो गए, राह सिंह की बेइमानी से रोके जाने लगी थी। टूलकिट का खेल रचकर छोड़ा […]

कविता

हास्य कविता

राजनेताओं की मौज चल पड़ी है, बात छोटी हो या फिर बहुत बड़ी है। ट्विटर ने सब आसान कर दिया है, ट्विटस की यूं बेधड़क लगी झड़ी है। बेसिर पैर जो मन आए लिख दो जी, फिर रिट्वीट पे आती शामत कड़ी है। जनता को उलझाएं नेता टविटर पे, जैसे चिन्ता इन्हें जनता की बड़ी […]

गीतिका/ग़ज़ल

आप

आप अगर बस इंसान ही बनकर रहते तो अच्छा था, बात- बात पे हल्ला न मचाते रहते तो अच्छा था। खुद की ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ कर झट से, दूसरों का ही सारा दोष न बताते तो अच्छा था। क्यों वतन से पहले स्वार्थ में लिप्त हुए जा रहे, कभी तो आप देश का मान […]

गीतिका/ग़ज़ल

अनकही बातें

कभी-कभी जाने क्यों उल्झाती हैं कुछ अनकही बातें, जाने अनजाने जब छुपाई जाती हैं कुछ अनकही बातें। मन में कोतूहल सा रहता और असमंजस में सोचता है दिल, क्या कहना था उसे सोच तड़पाती हैं कुछ अनकही बातें। बातें तो कईं ज़ुबां कह देती है अक्सर भावनाओं में बहकर, मन के भीतर मगर बहुत शोर […]