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  • “कठपुतली“

    “कठपुतली“

    हां,हम बन जाते हैं कठपुतली.. निर्जिव, निष्प्राण, आश्रित… भावनाओंके हाथों धागा हिलता है और हम नाचते – गाते, हसते – रोते… हां पर भावनाएं तो हमारी अपनी, फिर ? फिर क्यों हम बन जाते हैं कठपुतली???...

  • चिरकालिक व्यथा

    चिरकालिक व्यथा

    मैं कब से देख रही थी उसे,अथाह पीड़ा के साथ – साथ उसकी आंखों में घृणा की ज्वाला भी धधक रही थी। मेरी नजर ने उसके निगाहों का पीछा किया और जो दृश्य मुझे दिखाई दिया...

  •   मैं साथ क्यों ना थी ?

      मैं साथ क्यों ना थी ?

    सोचती हूं कभी जब तुम होंगे जीवन के सबसे खुशहाल पलों में…   मैं साथ क्यों ना थी? सोचती हूं कभी जब तुम जूझ रहें होंगे जीवन की उलझनों से   मैं साथ क्यों ना थी?...

  • प्रेम और त्याग

    प्रेम और त्याग

    प्रेम और त्याग धरा ! धैर्य धारण किए, खुद में समेटे अथाह प्रेम और त्याग, तकती रहती अपने आसमां.. क्षण – क्षण खुद में समाहित करती आसमां के बदलते हर स्वरूप.. कभी सूरज की ज्वाला से...

  • सौभाग्य चिन्ह…..

    सौभाग्य चिन्ह…..

    सुनो ना! क्या कहते हैं तुमसे मेरे सौभाग्य चिन्ह….. मेरे मांग का दमकता सिंदूर कुछ कहे है, क्या कहे है ?.. कि, नित छूओ तुम नये सोपान। मेरे माथे पर सुशोभित बिंदिया क्या बोले है? ये...

  • भारतीय रेल, ये भी जानो

    भारतीय रेल, ये भी जानो

    भारतीय रेल एशिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है और विश्व का चौथा। रोजाना लगभग दो करोड़ से ज्यादा लोग रेलवे से सफर करते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि सफर के दौरान जो...

  • कुछ ख्वाहिशें अबुझी सी……..

    कुछ ख्वाहिशें अबुझी सी……..

    कुछ ख्वाहिशें अबुझी सी कस कर बंधी मुठ्ठी से फिसलती रेत- सी क्यूं हैं??? छलकने की भी इजाजत है नहीं जिनको, वो बनकर अश्क की बूंदें ढलक जाती- सी क्यूं हैं??? चाहते हैं जिन लम्हों को...


  • आओ ना एक बार

    आओ ना एक बार

    आओ ना एक बार, भींच लो मुझे उठ रही एक कसक अबूझ – सी रोम – रोम प्रतीक्षारत आकर मुक्त करो ना अपनी नेह से। आओ ना एक बार, ढ़क लो मुझे, जैसे ढ़कता है आसमां...