लघुकथा

सच्ची आधुनिकता

सच्ची आधुनिकता सुबह- सुबह सोसाइटी के पार्क में मॉर्निंग वॉक करते हुए मिसेज शर्मा की नजर मिसेज बैनर्जी पर पड़ी। “हेलो मिसेज बनर्जी क्या बात है आप आजकल सोसाइटी की किटीज में नहीं दिख रहीं!” “ऐसे ही मिसेज शर्मा मन नहीं करता अब।” मिसेज बनर्जी ने पीछा छुड़ाने वाले अंदाज में कहा। “वैसे मिसेज बनर्जी […]

लघुकथा

विडम्बना

विडम्बना वही तो है, बिल्कुल वही। आज पाँच वर्षों के बाद उसे देखा मैंने हरिद्वार में पतितपावनी गंगा के किनारे। गेरुआ वस्त्र में लिपटी हुई, मुख पर असीम शांति लिए हुए चोटिल और बीमार पशुओं की सेवा करते करते हुए। एकबारगी मन हुआ दौड़ के उसके पास पहुँच जाऊँ और पूछूँ कि वो यहाँ इस […]

कविता

ये कुछ तुम जैसा है

ये कुछ तुम जैसा है कुछ नेह के धागे बुने हुए कुछ स्नेह की झरती बूंदों सी, कुछ यादें मीठी-मीठी हैं कुछ लम्हें रीते-रीते से कुछ होंठों पर मुस्कान लिए कुछ नमी भी है इन आँखों में, कुछ रक्त सा बहता है नस में कुछ साँस महकती सी हरदम, कुछ टीस सी उठती सीने में […]

लघुकथा

विवशता?

विवशता? “मम्मी आज मत दाओ ना, तुम नहीं होती हो तो अच्छा नहीं लगता!” रचना की तीन साल की बेटी पीहू ने खाँसते हुए कहा जिसे सुनकर रचना का मन रो पड़ा।   ” बेटा मीना आंटी हैं ना और पापा भी तो आपके पास आते ही रहते हैं। तुम तो मेली लानी बिटिया हो […]

लघुकथा

बिडम्बना

बिडम्बना “बहु ओ बहु कहाँ मर गयी!” सुषमा जी पूजा घर से चिल्ला रही थीं। आज नवरात्रि का पहला दिन था। पंडित जी को और भी घरों में जाना था वो थोड़ा जल्दी में थे। ” क्या बोलूँ पंडित जी! पता नहीं कैसी बहुरिया पल्ले पड़ गई। कल से ही बोल रखी थी सुबह सब […]

कविता

प्रेम और त्याग

धरा ! धैर्य धारण किए, खुद में समेटे अथाह प्रेम और त्याग, तकती रहती अपने आसमां.. क्षण – क्षण खुद में समाहित करती आसमां के बदलते हर स्वरूप.. कभी सूरज की ज्वाला से झुलसती ना केवल उसकी आंखें, फट जाता है कलेजा भी कभी कभी, कभी स्निग्ध चांदनी की शीतलता बन ओस की बूंदें बढ़ा […]

कविता

कोई सिखे तो…तुमसे।

किसी की उदासियों में भी खुशियां बिखेरना हंसना हंसाना कोई सिखे तो…तुमसे। अधूरे लफ्जों और बिन बात की बातों से भी सब कुछ कह देना कोई सीखे तो… तुमसे। खुद से अपरिचितों को खुद से ही परिचित कराना कोई सीखे तो… तुमसे। भावों और एहसासों को बिन कहे बिन बोले शब्दों में उकेरना कोई सीखे […]

कविता

ये कुछ तुम जैसा है

  कुछ नेह के धागे बुने हुए कुछ स्नेह की झरती बूंदों सी, कुछ यादें मीठी-मीठी हैं कुछ लम्हें रीते-रीते से कुछ होंठों पर मुस्कान लिए कुछ नमी भी है इन आँखों में, कुछ रक्त सा बहता है नस में कुछ साँस महकती सी हरदम, कुछ टीस सी उठती सीने में कुछ दर्द सा क्यों […]

कहानी

रिश्तों का पोस्टमार्टम भाग-2

रिश्तों का पोस्टमार्टम भाग-2 अब आगे पढिये………. “नहीं।” मैंने उत्सुकता के साथ उत्तर दिया। “तो फिर चलो तुम्हें घाट चैरासी के दर्शन कराते हैं और रात वहीं रूकने का पूरा जुगाड।” बड़े अनोखे अन्दाज़ में निशा ने कहा “जुगाड़” भारत में सबसे अधिक बोले जाने वाले शब्दों में से एक है, हमारे यहां तो शादी, […]

कहानी

रिश्तों का पोस्टमार्टम, भाग-1

रिश्तों का पोस्टमार्टम, भाग-1 “चलो कपड़े पहनते हैं अब इश्क़ पूरा हुआ” छी….. “बस यही रह गया है प्यार-मुहब्बत का पर्याय।” कहते हुये निशा ने किताबों को पास रखी मेज़ पर पटका। मैंने पीछे पलटकर देखा तो यो लगा मानो सुपरफास्ट ट्रेन का बेक़ाबू इन्जन मेरी ओर दौड़ा चला आ रहा है जिसे मैं असहाय […]