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  • होली पर एक रचना

    होली पर एक रचना

    इन्द्र्धनुष के रंगों जैसा, मुझको रंग दो, होली के रंगों को, सतरंगी कर दो। राग-द्वेष, बैर-भाव, नफ़रत जड़ से मिटाकर, बासंती अवसर को, खुशियों से भर दो। हिन्दू-मुस्लिम की बात नहीं करता यारों, मानवता जन-जन के...

  • दलित और मनुवाद

    दलित और मनुवाद

    भारत में आज अनेक संकट छाये हुए हैं – भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कट्टरवाद, धर्मांतरण, नैतिक अध : पतन, अशिक्षा, चरमरायी हुई स्वास्थ्य व्यवस्था, सफ़ाई की समस्या वगैरह – वगैरह | पर इन सभी से ज्यादा भयावह है...

  • भारतीय नववर्ष

    भारतीय नववर्ष

    भारतीय नववर्ष विक्रम संवत 2075 बदला है नववर्ष, नया संवत आया है, कुदरत ने रंग रूप, नया दिखलाया है। फूल रहे हैं प्लाश, खेत में सरसों फूली, चहूँ ओर हरियाली, मधुमास आया है। सूख सूख कर...

  • नव वर्ष की बात…

    नव वर्ष की बात…

    खुशियाँ हों, शुभ सन्देश मिलें, नूतन वर्ष सनातन हो। जी हाँ यही अवधारणा है भारतीय नववर्ष की।लेकिन जिस अंग्रेजी नव वर्ष को समपर्ण विश्व धूम धाम से मना रहा है और भारतीय भी अंधे होकर उसकी...

  • मुक्तक –  सिक्के

    मुक्तक – सिक्के

    हर दौर के सिक्के, सँभालकर रखता हूँ, हो इतिहास की पडताल, ख्याल रखता हूँ। बुजूर्गों ने बीते दौर का, इतिहास जिया है, उनके विचारों से संस्कार, खँगालकर रखता हूँ। — अ कीर्तिवर्धन

  • कविता

    कविता

    बहुत मुश्किल है हर बात का स्वागत करना, दिन को रात और रात को दिन, बयां करना। कोई चारा ही नहीं मेरे पास, बच्चों के सामने, सिवाय खामोश रह, उत्पात को अनदेखा करना। जरुरी है बिगड़े...

  • सहिष्णुता

    सहिष्णुता

    सहिष्णुता यानी सहनशीलता या सहन करने की शक्ति जो प्रत्येक व्यक्ति, समाज या राष्ट्र  अलग होती है और अलग अलग सन्दर्भों में  अलग। सहिष्णुता का सम्बन्ध मानसिक, शारीरिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक अथवा जातिवादी सन्दर्भों में भी लिया...

  • मुक्तक – हौसला

    मुक्तक – हौसला

    रेत की दीवार पर महल बना सकता हूँ, बहते पानी पर लिख कर बता सकता हूँ। मेरे हौसलों का अहसास नही है तुमको, बिना पंख के भी उडकर दिखा सकता हूँ। — अ कीर्तिवर्धन

  • कविता — हदें

    कविता — हदें

    हदें निर्धारित हैं नदी की, नहर की, तालाब व समंदर की, और स्त्री-पुरुष की भी। मगर जब टूटती हैं हदें बरसात में नदी-नहर पोखर या समंदर की आती है प्रलय और कर जाती है सर्वस्व विनाश।...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    सिमटने लगे हैं घर अब दादी के दौर के, बिखरने लगे हैं लोग जब गाँव छोड़ के। हो गया बड़ा मेरा गाँव, सरहद के छोर से, बनने लगे मकां, जब घरों को तोड़ के। सिमट गई...