गीत/नवगीत

गीत

जीत मे भी, हार मे भी, अविचल चलता रहूँगा| विश्वास का संबल लिये, मंजिलें गढता रहूँगा| था नही कुछ भी हमारा, जो यहाँ पर खो दिया हो, पा सकूँ सारा जहां, इस आस मे बढता रहूँगा| हैं कुछ बाधायें यहाँ, और पग में कंकर चुभ रहे, हौसलों की डोर थामे, नित सृजन करता रहूंगा| कौन […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

होली महोत्सव 

होली का त्यौहार है, प्यार और मनुहार का, रंगों का साथ है, अबीर और गुलाल का। होली हिन्दुओँ  का वैदिक कालीन पर्व है। इसका प्रारंभ कब हुआ, इसका कहीं उल्लेख  या कोई आधार नहीं मिलता है। परन्तु वेदों एवं पुराणों में भी इस त्यौहार के प्रचलित होने का उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल में होली […]

कविता

तिरंगा

तीन रंग मे रंगा हुआ है, मेरे देश का झन्डा, केसरिया, सफ़ेद और हरा, मिलकर बना तिरंगा| इस झंडे की अजब गजब, तुम्हे सुनाऊँ कहानी, केसरिया की शान है जग मे, युगों-युगों पुरानी| संस्कृति का दुनिया मे, जब से है आगाज़ हुआ, केसरिया तब से ही है, विश्व विजयी बना रहा| शान्ति का मार्ग बुद्ध […]

कविता

कविता

न जाने क्यूँ बने रहना चाहते हैं हम निरपेक्ष? कभी सशक्त पंख होने और उडने की क्षमता के बावजूद| कर लेते हैं आँख बन्द सामने बिल्ली को देखकर| और बिल्ली वह तो बैठी ही है शिकार की तलाश मे घात लगाये चरम पंथी बन| देखा है कभी कभी सीही को( कांटेदार छोटा सा जानवर) शेर […]

गीतिका/ग़ज़ल

नया दौर

नये दौर के इस युग में, सब कुछ उल्टा पुल्टा है, महँगी रोटी सस्ता मानव, गली गली में बिकता है। कहीं पिंघलते हिम पर्वत, हिम युग का अंत बताते हैं, सूरज की गर्मी भी बढ़ती, अंत जहां का दिखता है। अबला भी अब बनी है सबला, अंग प्रदर्शन खेल में, नैतिकता का अंत हुआ है, […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हौसला हो पास जिसके, पंख की जरुरत नही, प्रीत का विश्वास संग हो, साथ की जरुरत नही| आस्था ने सदा जिसे, जीने का संबल दिया हो, हर दिवस खुशियाँ मिलें, मधुमास की जरुरत नही| दिल मिले न कभी, ख्याल भी हों जुदा जुदा, साथ फिर भी चल रहे, अलगाव की जरुरत नही| एक हो मंजिल […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

खामोश रहता हूँ, मगर गूँगा नही हूँ, अकेला रहता हूँ, मगर तन्हा नही हूँ। अथाह जल है समन्दर में तजुर्बों का, भरा है खार जीवन का, मीठा नही हूँ। हूँ दरख्त बूढा, अब फल दे नही सकता, मगर छाया- ईंधन देता, ठूँठ नही हूँ। माना कि बच्चे व्यस्त हैं, निज जीवन में, सीखता हूँ आज […]

कविता

शब्द

शब्दों से खिलवाड नही कर पाता हूँ, छन्दों के बन्धन में नही बंध पाता हूँ| सीधी सच्ची बात तुम्हें मै बतलाऊँ, वेदो का सार प्रकृति उसमे पाता हूँ| अर्थ नही प्रधान कभी सम्बन्धों मे, रिश्तों से अनुबन्ध नही कर पाता हूँ| मानवता हित सीखा जग मे जीना मरना, सम्बन्धों से निर्वाह तभी मै कर पाता […]

मुक्तक/दोहा

सूरज ग्रहण

बन गया सूरज भी छल्ला, चाँद के प्रभाव से, आग का गोला छिपा, शीतलता के स्वभाव से| था कभी देता ऊर्जा, चाँद भी जिससे चमकता, आज अशक्त सा हो रहा है, चाँद के प्रभाव से| — अ कीर्ति वर्द्धन

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

धनतेरस

दीपावली पर्व कि बात करने से पहले कुछ बात धनतेरस यानी धन्वन्तरी त्रयोदशी के बारे में भी बता दूँ। पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के समय अमृत कलश धारण किये भगवान धन्वन्तरी प्रकट हुए थे | भगवान धन्वन्तरी ही आयुर्वेद के जनक कहे जाते हैं  और यह ही देवताओं के वैध भी माने जाते […]