कविता

मेरी प्रेरणा

हासिये पर बने वह लोग जो विकलांग होकर भी भीड़ से आगे चले हैं, मेरी प्रेरणा बने हैं….. विकलांगता जिनके लिए अभिशाप थी, अभिशाप की बैशाखियाँ तोड़ कर जो आगे बढे हैं, मेरी प्रेरणा बने हैं…. विकलांगता को जिन्होंने ललकारा है, आत्मशक्ति को संभाला है अपने निश्चय पर अड़े हैं, मेरी प्रेरणा बने हैं…. विकलांगता […]

गीतिका/ग़ज़ल

रिश्तों का संसार

सिमट रहे परिवार, विराना लगता है, रिश्तों का संसार, सुहाना लगता है। ताऊ- चाचा, बुआ- मामा कैसे होते, नये दौर में ख्वाब, पुराना लगता है। बेटा- बेटी नही चाहियें, नव पीढी को, एक बच्चे के लिये, मनाना पडता है। आजादी का जश्न मने, कोई रोके न टोके, घर घर में यह राग, सुनाई पडता है। […]

मुक्तक/दोहा

बेटी

किसने कहा कि सब बेटियाँ मरती हैं कोख में, पलते हुये देखा है हमने, माँ बाप के आगोश में। नही चाहिये बच्चे, अब एक से ज्यादा, करा देते हैं गर्भपात, कुछ पढे लिखे जोश में। चल रहा है फैशन देश में, बेटी बचाने का, दुनिया की निगाह में मुल्क, नीचा दिखाने का। लगता सारी बेटियाँ, […]

कविता

वर्ष 2020

निराशा के गहन तम में, आशा की जोत जलाता हूं, कोरोना के कालखंड में, पर्यावरण की बात बताता हूं। बिखर गये थे परिवार जो, रोजी रोटी के चक्कर में, हुये इकट्ठा छत के नीचे, प्यार का सार समझाता हूं। जाने कितने संकट आते, चीन पाक भी आंख दिखाये, संग हमारे विश्व खडा, भारत की ताकत […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक : बुजुर्ग

ताउम्र निभाता रहा फर्ज, खुद की खातिर कभी जिया ना, सुकुन से बैठकर नहीं खायी रोटी, दो घूंट पानी पिया ना। रात दिन एक कर दिया था, परिवार की खुशी के वास्ते, आरोप लगता है कर्तव्य था, अहसान कुछ भी किया ना। जो कुछ कमाया, दे दिया सब परिवार को, खुश रहें बच्चे, प्राथमिकता सदा […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक – पितृ पक्ष

पितृ पक्ष में कीजिए अपने पुरखों को याद, श्रद्धा भक्ति से कीजिए, अर्पण तर्पण आज। गाय को चारा देवें, कौओं को भोजन आस, पहले इनका ध्यान करें, करना इनके बाद। — अ कीर्ति वर्द्धन

गीतिका/ग़ज़ल

सन्तुष्टि

गरीबी को भी ओढ़ना और बिछाना जानता हूँ भूख से व्याकुल भले ही, मुस्कुराना जानता हूँ। अभावों में भी सन्तुष्टि, लक्ष्य जीवन का रहा, झोपड़ी में बच्चों संग, महल का सुख जानता हूँ। हैं बहुत तन्हां महल, सब रहें अलग अलग, बच्चों से हो बात कैसे, दर्द महल का जानता हूँ। अर्थ को समर्थ समझते, […]

कविता

देह यात्रा

वह करता है अक्सर देह से देह तक की यात्रा बिना उसकी मर्जी के और शायद बलात्कार भी उसकी आत्मा का, जिसे समझता है वह अपना संविधानिक अधिकार पति होने के कारण | और वह भी शायद यही समझती है कि उसका दायित्व है पति को खुश रखना | अपने अधिकार को भुलाकर, दायित्व कि […]

कविता

कविता

जब भी होता है मन व्यथित दोस्त को पता चल जाता है। रिश्तो नातों की भीड़ से अलग, दोस्त हर जगह नजर आता है। मचलते जज्बात अपनो की बेरुखी से दोस्त का ही कन्धा समझ आता है। दर्द बयां कर ना सका अपनों के सामने, दोस्त को कह मन हल्का हो जाता है। अ कीर्तिवर्धन

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

माना कि हुस्न तेरा कुछ लाजवाब है, कत्ल करने को नैन, छिपाने को हिजाब है, हमको भी कमतर मगर न मानिये, हमारे पास इश्क में, कुछ खास जज्बात हैं| तुम मारने की कुव्वत रखती हो, जानते हैं, खुद को बचाने का अपना अंदाज है, बेवफा होते हैं कातिल, दस्तूर जमाने का, इसलिए कातिलों से दूर […]