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  • मातृ देवो भव

    मातृ देवो भव

    माता की महिमा वेद, स्मृति, पुराण, इतिहास व अन्य ग्रन्थों में वर्णित है। शतपथ ब्राह्मण में माता, पिता और आचार्य के विषय में कहा गया है- ‘मातृमान् पितृमाना चार्यवान्’ तथा छान्दोग्य उपनिषद् में ‘आचार्यवान् पुरुषो वेद’ कहा गया है।...



  • सहिष्णुता

    सहिष्णुता

    सहिष्णुता का अर्थ है- सहनशीलता या क्षमाशीलता। निंदा, अपमान और हानि में अपराध करने वाले को दंड देने का भाव न रखना और अन्य लोगों के धार्मिक कर्मकाण्ड, खानपान और रीति-रिवाजों को सम्मान देते हुए उनसे...

  • क्षमाशीलता

    क्षमाशीलता

    क्षमाशीलता का अर्थ है निंदा, अपमान और हानि में अपराध करने वाले को दंड देने का भाव न रखना। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनका यह विशेष गुण रहा है। मनुस्मृति में धर्म के...


  • मूर्ति पूजा विमर्श

    मूर्ति पूजा विमर्श

    संसार में मूर्ति पूजा का इतिहास ज्ञात करने पर पता चलता है कि जैन-बौद्ध-काल से पूर्व इसका आरम्भ नहीं हुआ था। चीन के प्रसिद्ध इतिहास वेत्ता और यात्री फाहियान ने सन् 400 ई0 में भारत की...

  • निर्लिप्तता

    निर्लिप्तता

    निर्लिप्तता का अर्थ है सांसारिक मायामोह से दूर रहना। यह कर्म के बन्धन से निवृत्ति भी है। गीता में एक अपूर्व युक्ति बताई गई है, जिससे मनुष्य शुद्ध, पवित्र और निर्लिप्त या निष्कलंक बन सकता है।...


  • आरण्यक ग्रन्थों की आवश्यकता

    आरण्यक ग्रन्थों की आवश्यकता

    आरण्यक ग्रन्थ की आवश्यकता क्यों अनुभव की गई थी? ‘आरण्यक’ शब्द का अर्थ है- अरण्य में होने वाला। वन में होने वाले अध्ययन. अध्यापन, मनन, चिन्तन से सम्बन्धित विषयों का संकलन जिस ग्रन्थ में किया गया हो...