सामाजिक

धैर्य का गुण

धीरता, सहिष्णुता, स्थिरता का भाव और सहनशीलता धृति या धैर्य है। विषम परिस्थितियां उत्पन्न हो जाने पर भी मन में चिन्ता, शोक और उदासी उत्पन्न न होने देने का गुण घैर्य है। धैर्य मनुष्य को ऊंचा उठाने का एक उत्त्म गुण है। धैर्यवान व्यक्ति विपत्ति आने पर भी अपना मानसिक सन्तुलन बनाए रखता है और […]

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नैतिक शिक्षा

नीति का अर्थ है मनुष्य के जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के साधनरूप नियम, जिन पर चल कर इस जीवन और परलोक (पुनर्जन्म) में कल्याण की प्राप्ति हो। आचार शिक्षा का सम्बन्ध व्यक्तिगत जीवन से है, जिसमें आत्मोन्नति पर बल दिया गया है। नैतिक शिक्षा में व्यक्ति के आचार-विचार की शुद्धि के साथ ही […]

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भौतिकता और आध्यात्मिकता

क्या हम जानते हैं कि दुनिया में किस प्रकार से रहना चाहिए? इस पार्थिव जीवन के अतिरिक्त क्या कोई अन्य जीवन है जो लौकिक न होकर पारलौकिक है? इस संसार का जीवन तभी सार्थक हो सकता है जब वह उस पारलौकिक जीवन की एक कड़ी हो, अन्यथा अगर इहलौकिक जीवन सिर्फ इस लोक का है, […]

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वात्सल्य बन्धन

वात्सल्य का अर्थ है-बच्चों के प्रति स्नेह, लाड-प्यार, सुकुमारता। मनुष्य जीवन के प्रारम्भ होते ही रिश्तों के बन्धन बनने लगते हैं। सबसे पहला माता और पिता से जीवन का बीजरूप बनते ही सम्बन्ध बन जाता है। इसके बाद भाई, बहिन, दादा-दादी, नाना-नानी आदि से बन्धन जुड़ते हैं। इस संसार में जन्म लेने वाले बच्चों की […]

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मैं और मेरा

आमतौर पर लोग भौतिकता के जाल में फंस कर केवल अपने स्वार्थों के बारे में ही सोचते हैं। लोग चाहते हैं कि इतनी अधिक धन-सम्पत्ति अर्जत कर लें कि संसार में सुख प्राप्ति के सभी साधनों – वायु, जल, अन्न, धन व जमीन आदि पर सबसे पहले उनका स्वामित्व हो। इसके बाद भी यदि कुछ […]

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चिन्तन- मनन

चिन्तन का अर्थ है सोचना विचारना। किसी सुने हुए,पढे़ हुए या विचारणीय विषय पर एकान्त स्थान में बैठकर गम्भीर विचार करना मनन है। मननशीलता का गुण इसमें होने के कारण मानव मनुष्य कहलाता है। जैसा मन का स्वभाव या गुण होता है वैसा है वैसा ही मनुष्य होता है। मन आत्मा का सर्वोपरि साधन है। […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म ब्लॉग/परिचर्चा

आर्यसमाज और धर्मान्तरण

आज विभिन्न सम्प्रदायों में ईश्वर प्राप्ति हेतु जो विभिन्न पूजा पद्धतियां हैं उन्हीं को ही हम धर्म समझ लेते हैं या ऐसा कहें कि धर्म ही सम्प्रदाय के लिए प्रयोग में आने के कारण सम्प्रदायों के लिए भी रूढ़ हो गया है। इस समय अनेक मत-मतान्तर वर्तमान हैं जिनमें पारस्परिक मतभेद अज्ञान व्यक्तिगत लाभ भ्रम […]

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आत्म समर्पण

आत्म-समर्पण का अभिप्राय है अपनी खुदगर्जी या स्वार्थ का त्याग। जब तक ‘मै’ हूँ का भाव बना रहता है, तब तक आत्म समर्पण की भावना का विकास नहीं होता है। आत्म तत्त्व जब परमात्मा के प्रति अपने को समर्पित कर देता है तो उसका भाव होता है- ‘भगवन मेरी इच्छा नहीं, तेरी इच्छा पूर्ण हो’। […]

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समदर्शिता

समदर्शी शब्द का अर्थ है- दूसरों के दुःख और सुख को अपने जैसा समझने वाला या दूसरों के साथ सहानुभूति रखने वाला । गीता के अनुसार समदर्शी व्यक्ति सभी जीवों में एक जैसे चेतन तत्त्व का अनुभव करता है। संसार में ऐसे व्यक्ति कम ही मिलते हैं, जो अमीर-गरीब, काले-गोरे, स्वजातीय-विजातीय, मूर्ख-विद्वान् आदि भेदों को […]

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अभय की महिमा

गीता में दैवीय सम्पदा के परिचायक 26 गुणों का वर्णन करते हुए सबसे पहले अभय का उल्लेख किया गया है। अभय का अर्थ है-बाहरी भयों से मुक्ति। भय हैं- मौत का भय, रोग भय, धन-दौलत लुट जाने का भय, शत्रु प्रहार का भय और प्रतिष्ठा हानि का भय आदि। भय का अभाव ही अभय है। […]