कविता

कविता : मैं साहित्य का नन्हा कुकुरमुत्ता हूँ

मैं साहित्य का नन्हा सा कुकुरमुत्ता कवयित्री हूँ मुझे पेड़ बनते देर ना लगेगी पर शेष बचूँगी तक ना! चाटुकारता करूँगी कभी कागज पे फोटो बन चिपकने के लिए कभी मंच पर मुँह दिखाने के लिए तो रचनाओं को छपवाने के लिए! बिक जाऊँगी इन्हें संभालने में नाम होना तो दूर रहा नाम सामने लाने […]

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कविता : जुल्फों की बूदों में तुम

झटकूँ जब अपनी ही जुल्फों को भीगीं बूँदे जब इधर उधर उड़ती हुई करती जब स्पर्श मुझे! कुछ चेहरे को कुछ ओंठों को कुछ बदन को पर जैसे ही वो बूँद दिल को छूती है मेरा मन शांत हो जाता है! जैसे तुमने बूँदो का रूप लेकर मुझे दिल से लगा लिया हो कभी ना […]

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शुक्रिया मेरी कलम

जब मैं छोटी थी बच्ची थी चोक से सिलेट पर लिखा करती थी कभी पेंसिल से लिख रब़र से मिटाया करती थी कभी स्केच से रंगीन चित्रों को सजाया  करती थी जब कलम मेरे हाथ आई तो समझी अब बड़ी हो चुकी हूँ परिपक्व हो चुकी हूँ! खुशी का कोई ठिकाना ना रहा काले,ब्लू और […]

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कविता : पीड़ा

ये पीड़ा वो पीड़ा जाने कितनी पीड़ाओं में व्यक्तित्व दबा है! देह पीड़ा में रोगों की छाया से शरीर कुंद हुआ मन पीड़ा में ह्रदय धात हुआ अंर्तमन अंत:पीड़ा में अवचेतन शून्य हुआ समाजिक पीड़ा में मानंसिक कुठा पैदा हुई सबके सब पीड़ा में है! और ये मिलती कहाँ से खुद मुझसे मेरे अपनों से […]

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कविता : चमेली के फूल

जब मैं छोटी थी फूलों की खुशबू मुझे इत्र से ज्यादा भाँती थी उन दिनों पापा के साथ पुलिस थाना के कैपंस में ही टाली के बने दो छोटो कमरे रहते थे थाना के चारों ओर बाग बगीचे थे आम,कटहल,केला,जामुन,शरीफा के फल थे क्यारियों में चमेली के फूल लगे थे मैं यही सोचती थी ये […]

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कविता : रात और दिन

मेरे हिस्से में रात आई रात का रंग काला है इसमें कोई दूजा रंग नहीं मिला इसलिए सदा सच्चा है मेरी ज़िन्दगी भी अकेली है कोई दूजा ना मिला! फिर दिन का हिस्सा सफेद रंग का है जो दूजे रंग से मिल बना झूठा सा दिखता है फिर भी जीवन में विविध रंगों को भरता […]

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“ना तुम ना तुम्हारी आभास आकृतियाँ”

  यहाँ भी वहाँ भी जहाँ भी देखती हूँ वहाँ तुम ही तुम नज़र आते हो ये मेरी नजरों का धोखा है या मन का भ्रम! उड़ते बादलो में चलती हवाओं में बहती नदियों में लहराते खेतों में खिलते फूलों में उड़ते पक्षियों में तुम नज़र आते हो ! मेरे आसपास गुजरते लोंगों में रास्ते […]

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“गौरैया को बचाओं”

फूदक फदूक के घर आँगन में ची ची ची चहकती जब गौरेया नन्हें मुन्ने भागते इसके पीछे आज हाथ से ना जाने देगें इसको जैसे ही हाथों में आती वैसे ही पलक झँपकते फुर्र हो जाती ! फसलों में लगने वाले कीड़ों को खा बढ़ती मानव जनसंखा का सदा ही पेट भरती गौरेया ! सुख […]

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“फूलों हो या तुम”

  फूलों पर सो रही हूँ तुम्हारा सीना समझकर फूलों की डाली पर झूल रही तुम्हारा कंधा समझकर फूलों को सहला रही तुम्हारे बाल समझ कर फूलों को चूम रही तुम्हारे लब समझकर फूलों को लिपट रही तुम्हारी बाहें समझकर फूलों को प्यार कर रही तुम समझकर पर जैसे ही काँटे चुभते हाथों को तो […]

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“अकेली जिन्दग़ी”

अकेली जिन्दग़ी भी कोई जिन्दग़ी है ! अपने साये से भी घुटन होती है अपनी लाश को खुद के ही कंधे पे ठोना है पर कब तक ढोउँ इसको मैं थक चुकी हूँ अकेले चलते चलते अकेली जिन्दग़ी भी कोई जिन्दग़ी है ! मैं तुम्हारे काँधे पर सिर रखके हँसना और रोना चाहती हूँ तुम्हारे […]