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  • शुक्रिया मेरी कलम

    शुक्रिया मेरी कलम

    जब मैं छोटी थी बच्ची थी चोक से सिलेट पर लिखा करती थी कभी पेंसिल से लिख रब़र से मिटाया करती थी कभी स्केच से रंगीन चित्रों को सजाया  करती थी जब कलम मेरे हाथ आई...

  • कविता : पीड़ा

    कविता : पीड़ा

    ये पीड़ा वो पीड़ा जाने कितनी पीड़ाओं में व्यक्तित्व दबा है! देह पीड़ा में रोगों की छाया से शरीर कुंद हुआ मन पीड़ा में ह्रदय धात हुआ अंर्तमन अंत:पीड़ा में अवचेतन शून्य हुआ समाजिक पीड़ा में...


  • कविता : रात और दिन

    कविता : रात और दिन

    मेरे हिस्से में रात आई रात का रंग काला है इसमें कोई दूजा रंग नहीं मिला इसलिए सदा सच्चा है मेरी ज़िन्दगी भी अकेली है कोई दूजा ना मिला! फिर दिन का हिस्सा सफेद रंग का...


  • “गौरैया को बचाओं”

    “गौरैया को बचाओं”

    फूदक फदूक के घर आँगन में ची ची ची चहकती जब गौरेया नन्हें मुन्ने भागते इसके पीछे आज हाथ से ना जाने देगें इसको जैसे ही हाथों में आती वैसे ही पलक झँपकते फुर्र हो जाती...

  • “फूलों हो या तुम”

    “फूलों हो या तुम”

      फूलों पर सो रही हूँ तुम्हारा सीना समझकर फूलों की डाली पर झूल रही तुम्हारा कंधा समझकर फूलों को सहला रही तुम्हारे बाल समझ कर फूलों को चूम रही तुम्हारे लब समझकर फूलों को लिपट...

  • “अकेली जिन्दग़ी”

    “अकेली जिन्दग़ी”

    अकेली जिन्दग़ी भी कोई जिन्दग़ी है ! अपने साये से भी घुटन होती है अपनी लाश को खुद के ही कंधे पे ठोना है पर कब तक ढोउँ इसको मैं थक चुकी हूँ अकेले चलते चलते...