कविता

कविता

मधुर भावना , भावुक मन की , गिरती उठती, चलती रुकती प्रीत हृदय में, कभी न छिपती ।।1।। अब कुछ कहूं , कैसे चुप रहूं, अन्तर मन का भेद कैसे कहूं प्रीत भरी पाती , कैसे अब पढ़ूं।।2।। मेरे जीवन की , कम्पित मन की, धुंधले दर्पण की , धूमिल सी छवि , टूटती सांस […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका —स्वप्न सुहाने

मन की बातें मन ही जाने , बात किसी की एक न माने ।(1) जोगन बन कर बनबन घूमें , कमली की गत कमली जाने । (2) आज उजागर हुए अछूते , ये अनुपम सन्दर्भ पुराने । (3) शब्द जाल में गुँथ कर सपने , बन जाते नित नये तराने । (4) परदेसी से लगन […]

कविता

कविता

अनगिनत बाधाएँ तुम्हें , विचलित करेंगी सर्वदा । धैर्य को खोना नहीं, उन्नत रखो मस्तक सदा। (1) ले तिरंगा शान से , सद्भाव रख बढ़ना सदा । विजय पथ पर बढ़ चलो , कर दूर सारी आपदा ।(2) वीर हो तुम, धीर बन, पंकज सदृश खिलते रहो । माँ भारती की शान में , तुम […]

संस्मरण

दिव्य अनुभूति — एक सत्य लघु कथा

जीवन के किस मोड़ पर क्या घटना घटित हो जाये, इस पर मनुष्य का कोई बस नहीं चलता। 28/07/15 को अपने पति की द्वितीय पुण्य तिथि पर नितांत अकेली खड़ी उनके फोटो को निहार रही थी । आँखों में आँसुओं का समन्दर था जो अनवरत बह रहा था “क्यों इन मोतियों को लुटा रही हो […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका -प्रेम का बंधन न कोई

शब्द का मंथन न कोई। प्रेम का बंधन न कोई । व्यक्त कर दे भावना को । राह में अड़चन न कोई । राह पर अपनी चला चल । व्यर्थ कर चिंतन न कोई । आज अपने कल न होंगे । श्राद्ध ना तर्पण न कोई । नाम को मन में बसा ले । ओम […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका : एक विनम्र श्रद्धांजलि

सपूत मातृभूमि के, उठो कि माँ पुकारती । कलाम तुम चले कहाँ कि रो रही है भारती । नजर उठा के एक बार मुस्करा के देख लो । हर आँख आज नम हुई, तुम्हें ही है निहारती । उठो भरत की बेटियों, कलाम को करो विदा । सजा लो दीप थाल में, उतारो आज आरती […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

चंद्रमा की छवि मनोहर मधुर रस टपका गई । चाँदनी की धवल चादर प्रेम से सहला गई । चन्द्र किरणों ने अनोखा सेतु जब निर्मित किया। नृत्य करती अप्सरायें भी धरा पर आगईं । प्रकृति ने सुर ताल छेड़े नाद स्वर झंकृत हुआ । जलधि की लहरें मचल कर व्योम से टकरा गई । प्रेम […]

कविता

पगडंडी –छाया चित्र

और कुछ पल बाद, एक साल और कम हो जाएगा तेरे मेरे बीच की दूरियां निरंतर कम हो रही हैं ठीक ही तो है देखूं जरा अवनी पर पुलकित हो रजनी पर चन्द्र किरण आई हैं चाँदी की चुनर ओढ़ प्रीतम से नयन जोड़ बरबस मुस्काई हैं खिड़की की ओट खड़ी कौतुक से देखरही संदेशा […]

कविता

क्या कविता आग लगा सकती है?

क्या कविता आग लगा सकती है? हाँ , कविता रोते को हँसा सकती है हँसते को रुला सकती है दस्यु को मानव बना सकती है भूखे को दानव बना सकती है बिन होली फाग खिला सकती है पानी में आग लगा सकती है किन्तु कब? जब कलम उठाने वाले के दिल में एक जुनून होगा […]

मुक्तक/दोहा

दो मुक्तक

ठंडी बयार मन को मेरे गुदगुदा गई झुलसे हुए बदन को थोड़ा सरसरा गई काली घटा को प्यार से दामन में समेटे हौले से इक फुहार मुझे थपथपा गई पंच तत्व में सूर्य रश्मि ने ऊर्जा का संचार किया चित्र कार ने नवल चित्र का रंगों से श्रृंगार किया शस्य श्यामला माँ ने भरी बलायें […]