कविता

दो बूंद अश्रु के मेरी आंखों से भी बहेंगे

बस दो बूंद अश्रु के मेरी आंखों से भी बहेंगे छिन गये घर के चिराग जिनके उनके गम को क्या कहेंगे सिने पर पडा पत्थर हैं नीत झर – झर नीर बहेंगे सूना आंगन सूनी कोख किस पर ममता नेह भरेंगे मां बिलखे बाबा निढाल कैसे अब लाल बिन रहेंगे छिन गये सहारे जिनके कैसे […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ख्वाहिशों के इन परिन्दों को उड़ाने दे जरा अपनी आभा आसमानों तक बढ़ाने दे जरा मुश्किलों का दौर गर आए तो आने उसे उनको भी अपने इरादों को चढ़ाने दे जरा राह हो कांटों भरी या फैली कालिमा यहाँ हौसलों के हार में मोती जडा़ने दे जरा ठोकरें खाकर यहाँ अक्सर संभलता आदमी जिंदगी को […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

किसी की याद में अक्सर तड़पना ठीक लगता है कोई जब दूर जाये तो तरसना ठीक लगता है परिन्दों को कफ़स की तीलियों से दूर ही रखना खुले आकाश में इनका चहकना ठीक लगता है तुम्हें ये चाँद सूरज और तारे सब मुबारक हों मुझे ख़ुद नूर से मेरे दमकना ठीक लगता है ये शामे-गम […]

कविता

सीख

चींटी से सीखी हैं मैंने निरन्तर बढ़ने की कला गिर के संभलना संभल कर फिर चढ़ना धैर्य के साथ चलते रहना और बार बार संभलने की कला राह में अवरोध भले हो चाहे हो डगर कांटों भरी अपने लक्ष्य को पाने का उसका दृढ़ संकल्प चींटी से सीखी हैं मैंने जीवन सफल बनाने की कला […]

कविता

पलों का खेल

पल-पल मे बदले जिंदगानी पल मे मिले खुशियां अपार पल मे बिखर जाता संसार पलों का अद्भुत खेल ये देखा पलों पर टिका जिंदगी का मेला पल में  तोला पल मे माशा हैं अजब जीवन का तमाशा बिखरते सपने भी एक पल में सवंरते अरमान भी मन तन तल में है पलों का मेल ये […]

कविता

सूरज

प्रगाढ़ प्रेम के परिचायक हो भानु तुम सदियों से धरा का आंचल स्नेह की हरियाली से भरते आये हो कण कण पुलकित तुमसे हर जीव के तुम सरमाये हो रश्मियों का पहरा भोर में हर कली मे तुम मुस्कायें हो निशा मे शशी जब जब आकर धरणी से तुम्हारा बिछोह करवाता हैं फिर मिलन की […]

कविता

नैना

कभी उठती-कभी झुकती शर्म से सराबोर ये नैना कभी जलती कभी बुझती दीये की कोर ये नैना कभी चलती कभी थमती नदी का छोर ये नैना कभी जगती कभी सोती बड़े चितचोर ये नैना कभी इत तो कभी उत डोलते पतंग की डोर ये नैना कभी हौले से पलक को खोलती नयी सी भोर ये […]

कविता

मुखौटा

मुखौटा तूने ओढा है मुखौटा मैंने ओढा है मगर नजरें तो सारे भेद जानती हैं सुन हंसी तेरी भी मुखरती हैं हंसी मेरी मुखरती हैं दिलों की चोट से हमदम कहां अनजान हैं हम सुन पिघलति तेरी आंखों की पुतलियाँ बोलती हैं ये गमों का ये तराना तो हमारा भी तुम्हारा भी सुन जमानें को […]

गीतिका/ग़ज़ल

कलम कोई थमा दे आज

मेरे इन नन्हें हाथों में कलम कोई थमा दे आज मुझे भी शिक्षा का पावन मार्ग कोई बतलादे आज जो हैं सौदागर इस जग के जिनकी सब जयकार करें हाथ रखे सर पर हमारे कुछ तो स्नेह दिखादे आज जो ढाबे पर टिप देकर हमको अपनी शान समझते हैं उंगली थाम हमारी वो राह स्कूल की […]

कविता

मेरे घर का किवाड़

मेरे घर का किवाड़ आज भी बुला रहा है मुझे अपनी चरमराहट से बैचेन होकर देख रहा है किसी न किसी आहट पे बचपन सारा बीत गया उसकी ओट मे लुक छिपकर कभी हंसती हुई कनखियों से तो कभी कुछ पलों मे घुट घुटकर मन की वेदना को समझा अपनी कुंडियों मे सहेजा नही उडेला […]