गीतिका/ग़ज़ल

गीत -गीतिका

गीत/गीतिका उठती है कुछ बात हृदय में क्योंकर सत्य विसारा जाए जा देखें रावण की बगिया सीता समर निहारा जाए।। छुवा नहीं उसने जननी को जिसने धमकाया अवनी को पतितों को बतलाया जाए गिन राक्षस को मारा जाए सीता समर निहारा जाए।। संविधान सर्वोत्तम कृति है जीवन अपनी अपनी वृति है नैतिक मूल्य सँवारा जाए […]

कविता

कुंडलिया

“कुंडलिया” उलझन में है गागरी, लेकर पतली डोर। लटका रक्खी कूप में, यह रिश्ते की छोर।। यह रिश्ते की छोर, भोर टपकाए पानी। ठिठुर रही है रात, घात करती मनमानी।। कह गौतम कविराय, न राह सुझाती सुलझन। गोजर जैसे पाँव, लिए लहराती उलझन।। उलझन मत आना अभी, लेकर अपने पाँव। गाय बछेरु ठिठुरते, काँप रहा […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

“मुक्तक” नहीं किनारे नाव है, नहीं हाथ पतवार। सूख रहा जल का सतह, नहीं उदधि में धार। नयन हुए निर्लज्ज जब, मन के भाव कुभाव- स्वारथ की नव प्रीति है, नहीं हृदय में प्यार।।1 जल प्रवाह में कट रहे, वर्षों खड़े कगार। आर-पार नौका चली, तट पर भीड़ अपार। कैसा खेवनहार यह, नई नवेली नाव- […]

कविता

“कुंडलिया”

कुंडलिया माना दिल से आप ने, जिसको अपना देश। वही खा गया आप को, धर राक्षस का वेश।। धर राक्षस का वेश, विशेष कहूँ क्या मितवा। बँटवारे की रात, सो गए सारे हितवा।। कह गौतम कविराय, छद्म को किसने जाना। राजा हुए गुलाम, ध्येय गद्दी को माना।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

गीतिका, मात्रा भार-30, समांत- अल, पदांत- आसी कुछ चले गए कुछ गले मिले कुछ हुए मित्र मलमासी कुछ बुझे बुझे से दिखे सखा कुछ बसे शहर चल वासी कुछ चढ़े मिले जी घोड़े पर जिनकी लगाम है ढ़ीली कुछ तपा रहे हैं गरम तवे कुछ चबा रहे फल बासी।। कुछ फुला फुला थक रहे श्वांस […]

कविता

कुंडलिया

“कुंडलिया” अंकुश अपने आप पर, रखना मित्र जरूर। जीवन की नौका बहुत, होती है मगरूर।। होती है मगरूर, बहा ले जाती धारा। बहुत फिसलते घाट, न पकड़े बाँह किनारा।। गौतम मीठी बात, करो दिल होता है खुश। संयम अरु नियंत्रण, सु-गहना होता अंकुश।। खलती है दिन-रात प्रिय, पावंदी की बात। बचपन की हर चाल पर, […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

“मुक्तक” भाग्य बिना होते नहीं, साजन कोई कर्म। कर्म कीजिये लगन से, यही भाग्य का मर्म। क्या छोटा क्या है बड़ा, दें रोजी को मान- लग जाओ प्रिय जान से, इसमें कैसी शर्म।। सब नसीब का खेल है, चढ़ता पंगु पहाड़। पत्थर जैसा फल लिए, खड़े डगर पर ताड़। न छाया नहीं रस मधुर, न […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

“मुक्तक” बहुत अरमान था दिल में कि इक दिलदार मिल जाए। मेरे इस बाग में भी फूल इक गुच्छदार खिल जाए। समय की डोर पकड़े चल रहा था ढूढ़ता मंजिल- मिला दो दिल सनम ऐसे कि पथ पतवार हिल जाए।। बहुत अहसान होगा आप का मान मिल जाए। तरस नयनों की मिट जाए परत पहचान […]

मुक्तक/दोहा

चतुष्पदी

“चतुष्पदी” लगा न देना यार दुबारा दरवाजे पर फिर ताला। भरा मिला है बहुत दिनों के बाद प्रेम से तर प्याला। कहा सभी ने पी लो इसको दवा बहुत अक्सीर है- मगर न लेना हद से ज्यादे पी जाती है मधुशाला।। लगा लगा कर थक जाती है दुनिया अपने घर ताला। खुली हुई खिड़की से […]

कविता

पिरामिड

“पिरामिड” ये बीज फसल खलिहान थका किसान पहनता खाद ओढ़ता व्याज कर्ज।। है प्याज कीमती उगती है उफनती है थाली में मेवाती महँगाई मार जाती।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी