मुक्तक/दोहा

मुक्तक

“मुक्तक” व्यंग ढंग का हो अगर, तो करता बहुमान। कहने को यह बात है, पर करता पहचान। भागे भागे क्यों फिरे, अपने घर से आप- और दुहाई दे रहे, मान मुझे मेहमान।। बनी बनाई रोटियाँ, खाता आया पाक। अब क्या तोड़ेगा सखे, लकड़ी जल भइ खाक। जाति-पाति के नाम पर, चला रहा है राज- कहाँ […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

“मुक्तक” नया सवेरा हो रहा, फिर क्यों मूर्छित फूल। कुछ रहस्य इसमें छुपा, मत करना फिर भूल। बासी खाना देखकर, क्यों ललचायें जीव- बुझ जाएगी चाँदनी, शूल समाहित मूल।। नित नव राह दिखा रहे, कुंठा में हैं लोग। बिना कर्म के चाहते, मिल जाए मन भोग। सही बात पर चीखते, झूठों के सरदार- समझ न […]

कविता

कुंडलिया

“कुंडलिया” चादर बर्फीली तनी, पसरा बर्फ दुवार कैसे ओढ़े री तुझे, हड्डी चढ़ा बुखार।। हड्डी चढ़ा बुखार, निखार कहाँ से लाऊँ काँप रहे हैं होठ, गीत प्रिय कैसे गाऊँ।। कह गौतम कविराय, हाय री ठंडी दादर गर्म न होती रात, दिवस में भीगे चादर।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

गीतिका/ग़ज़ल

गीत -गीतिका

गीत/गीतिका उठती है कुछ बात हृदय में क्योंकर सत्य विसारा जाए जा देखें रावण की बगिया सीता समर निहारा जाए।। छुवा नहीं उसने जननी को जिसने धमकाया अवनी को पतितों को बतलाया जाए गिन राक्षस को मारा जाए सीता समर निहारा जाए।। संविधान सर्वोत्तम कृति है जीवन अपनी अपनी वृति है नैतिक मूल्य सँवारा जाए […]

कविता

कुंडलिया

“कुंडलिया” उलझन में है गागरी, लेकर पतली डोर। लटका रक्खी कूप में, यह रिश्ते की छोर।। यह रिश्ते की छोर, भोर टपकाए पानी। ठिठुर रही है रात, घात करती मनमानी।। कह गौतम कविराय, न राह सुझाती सुलझन। गोजर जैसे पाँव, लिए लहराती उलझन।। उलझन मत आना अभी, लेकर अपने पाँव। गाय बछेरु ठिठुरते, काँप रहा […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

“मुक्तक” नहीं किनारे नाव है, नहीं हाथ पतवार। सूख रहा जल का सतह, नहीं उदधि में धार। नयन हुए निर्लज्ज जब, मन के भाव कुभाव- स्वारथ की नव प्रीति है, नहीं हृदय में प्यार।।1 जल प्रवाह में कट रहे, वर्षों खड़े कगार। आर-पार नौका चली, तट पर भीड़ अपार। कैसा खेवनहार यह, नई नवेली नाव- […]

कविता

“कुंडलिया”

कुंडलिया माना दिल से आप ने, जिसको अपना देश। वही खा गया आप को, धर राक्षस का वेश।। धर राक्षस का वेश, विशेष कहूँ क्या मितवा। बँटवारे की रात, सो गए सारे हितवा।। कह गौतम कविराय, छद्म को किसने जाना। राजा हुए गुलाम, ध्येय गद्दी को माना।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

गीतिका, मात्रा भार-30, समांत- अल, पदांत- आसी कुछ चले गए कुछ गले मिले कुछ हुए मित्र मलमासी कुछ बुझे बुझे से दिखे सखा कुछ बसे शहर चल वासी कुछ चढ़े मिले जी घोड़े पर जिनकी लगाम है ढ़ीली कुछ तपा रहे हैं गरम तवे कुछ चबा रहे फल बासी।। कुछ फुला फुला थक रहे श्वांस […]

कविता

कुंडलिया

“कुंडलिया” अंकुश अपने आप पर, रखना मित्र जरूर। जीवन की नौका बहुत, होती है मगरूर।। होती है मगरूर, बहा ले जाती धारा। बहुत फिसलते घाट, न पकड़े बाँह किनारा।। गौतम मीठी बात, करो दिल होता है खुश। संयम अरु नियंत्रण, सु-गहना होता अंकुश।। खलती है दिन-रात प्रिय, पावंदी की बात। बचपन की हर चाल पर, […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

“मुक्तक” भाग्य बिना होते नहीं, साजन कोई कर्म। कर्म कीजिये लगन से, यही भाग्य का मर्म। क्या छोटा क्या है बड़ा, दें रोजी को मान- लग जाओ प्रिय जान से, इसमें कैसी शर्म।। सब नसीब का खेल है, चढ़ता पंगु पहाड़। पत्थर जैसा फल लिए, खड़े डगर पर ताड़। न छाया नहीं रस मधुर, न […]