गीत/नवगीत

भोजपुरी, होली गीत

“होली गीत” होरी खेलन हम जईबे हो मैया गाँव की गलियाँ सरसों के खेतवा फुलईबे हो मैया गाँव की गलियाँ।। रंग लगईबें, गुलाल उड़ेईबें, सखियन संग चुनर लहरैबें भौजी के चोलिया भिगेईबें हो मैया गाँव की गलियाँ…..होरी खेलन….. पूवा अरु पकवान बनेईबें, नईहर ढंग हुनर दिखलईबें बाबुल के महिमा बढ़ेईबें हो मैया गाँव की गलियाँ…..होरी […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

मुक्तक जी करता है जी भर नाचूँ, जीवन में झनकार लिए। सारे गुण की भरी गागरी, हर पन का फनकार लिए। सभी वाद्य बजने को आतुर, आए कोई वादक तो- शहनाई वीणा औ डमरू, सुरभित स्वर संसार लिए।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुर

कविता

मुक्तक

“मुक्तक” बहुत दिनों के बाद मिला है बच्चों ऐसा मौका। होली में हुडदंग नहीं है नहीं सचिन का चौका। मोबाइल में मस्त हैं सारे राग फाग फगुहारे- ढोलक और मंजीरा तरसे तरसे पायल झुमका।। पिचकारी में रंग नहीं है नहीं अबीर गुलाला। मलो न मुख पर रोग करोना दूर करो विष प्याला। चीन हीन का […]

गीतिका/ग़ज़ल

दोहा गीतिका

“दोहा गीतिका” री बसंत क्यों आ गया लेकर रंग गुलाल कैसे खेलूँ फाग रस, बुरा शहर का हाल चिता जले बाजार में, धुआँ उड़ा आकाश गाँव घरों की क्या कहें, राजनगर पैमाल।। सड़क घेर बैठा हुआ, लपट मदारी एक मजा ले रही भीड़ है, फुला फुला कर गाल।। कहती है अधिकार से, लड़कर लूँगी राज […]

कविता

कुंडलिया

“कुंडलिया” बंसी मेरे बीच में, क्यों आती है बोल कान्हा की परछाइयाँ, घूम रही मैं गोल घूम रही मैं गोल, राधिका बरसाने की मत कर री बेहाल, उमर है हरषाने की कह गौतम कविराय, मधुर बन पनघट जैसी छोड़ अधर रसपान, कृष्ण की प्यारी बंसी।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

कविता

कुंडलिया

“कुंडलिया” मेरे बगिया में खिला, सुंदर एक गुलाब गेंदा भी है संग में, मीठा नलका आब मीठा नलका आब, पी रही है गौरैया रंभाती है रोज, देखकर मेरी गैया कह गौतम कविराय, द्वार पर बछिया घेरे सुंदर भारत भूमि, मित्र आना घर मेरे।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

कविता

मुक्त काव्य

“मुक्त काव्य” पेड़ आम का शाहीन बाग में खड़ा हूँ फलूँगा इसी उम्मीद में तो बढ़ा हूँ जहाँ बौर आना चाहिए फल लटकना चाहिए वहाँ गिर रही हैं पत्तियाँ बढ़ रही है विपत्तियां शायद पतझड़ आ गया अचानक बसंत कुम्हिला गया फिर से जलना होगा गर्मियों में और भीगना होगा बरसातियों में फलदार होकर भी […]

गीतिका/ग़ज़ल

दोहा गीतिका

“दोहा गीतिका” मुट्ठी भर चावल सखी, कर दे जाकर दान गंगा घाट प्रयाग में, कर ले पावन स्नान सुमन भाव पुष्पित करो, माँ गंगा के तीर संगम की डुबकी मिले, मिलते संत सुजान।। पंडित पंडा हर घड़ी, रहते हैं तैयार हरिकीर्तन हर पल श्रवण, हरि चर्चा चित ध्यान।। कष्ट अनेकों भूलकर, पहुँचें भक्त अपार बैसाखी […]

कविता

कुंडलिया

“कुंडलिया” बदरी अब छँटने लगी, आसमान है साफ धूप सुहाना लग रहा, राहत देती हाँफ राहत देती हाँफ, काँख कुछ फुरसत पाई झुरमुट गाए गीत, रीत ने ली अंगड़ाई कह गौतम कविराय, उतारो तन से गुदरी करो प्रयाग नहान, भूल जाओ प्रिय बदरी।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

लघुकथा

हाचड़ (फुरसतिया मनोरंजन)

“हाचड़” (फुरसतिया मनोरंजन) कौवा अपनी राग अलाप रहा था और कोयल अपनी। मजे की बात, दोनों के श्रोता आँख मूँदकर आत्मविभोर हो रहे थे।अंधी दौड़ थी फिर भी लोग जी जान लगाकर दौड़ रहे थे। न ठंड की चिंता थी न महंगाई के मार की, न राष्ट्र हित की और न राष्ट्र विकास की। अगर […]