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  • “गीतिका”

    “गीतिका”

    छंद – विधाता (मापनी युक्त ), मापनी- 1222 1222 1222 1222 उषा की लाल लाली रे बता किरनें कहाँ छायी दिशाओं में अंधेरा ले खता कहने कहाँ आयी परख ले खुद प्रभा है तूँ तुझे किसकी...

  • “गीतिका”

    “गीतिका”

    मापनी- 1222 1222 1222 पुकारे गोपियाँ कान्हा मुरारी हो नचाते अब कहाँ ग्वाला मदारी हो बजाते किस गली बंसी रसीली तुम गिराते पर कहाँ दहिया अनारी हो। गए वो दिन विरानी हो गई रतिया चराते तुम...

  • रौद्र रस (चौपाई)

    रौद्र रस (चौपाई)

    नर नारी चित बचन कठोरा, बिना मान कब गुंजन भौंरा कड़ी धूप कब लाए भोरा, रौद्र रूप काहुँ चितचोरा।।-1 सकल समाज भिरे जग माँहीं, मर्यादा मन मानत नाहीं यह विचार कित घाटे जाहीं, सबकर मंशा वाहे...

  • “मुक्तक”

    “मुक्तक”

    कवायत भी होगी सियासत भी होगी। पर बिन इजाजत क्या हिमायत भी होगी। बोली और भाषा क्यों बहरी हुई है- किसको रियायत जब रवायत भी होगी॥-1 मंजूरी मजूरी की बातें भी होंगी। मजबूरी गरीबी कमी कैसे...

  • “मुक्तक”

    “मुक्तक”

    उछलती मौज़ा बहारें ला, दरिया दिली दर्द लहराती। मचलती नौका किनारे ला, सरिता मिली सर्द विखराती। जहाँ नित तूफान आते है, भिगाते मन मोंह जाते हैं- पकड़ती बहियाँ किनारे ला, खुशियाँ खिली जर्द मचलाती॥ रुख हवावों...

  • “हाइकु”

    “हाइकु”

    उड़ते खग विश्वास अडिग है उठे न पग॥-1 अंधी दौड़ है त्रिभंगी ढ़लान है क्या पहाड़ है॥-2 चिड़िया गाए डाली डाली शोर है चित चोर हैं॥-3 सुंदर मैना चाँदनी संग रैना रात रानी है॥-4 हँसी सहेली...

  • “गीत”

    “गीत”

    चलो री हवा पाँव चेतक लिए उड़े जा वहाँ छाँव चंदन हिए जहाँ वास सैया सुनैनन भली प्रभा काल लाली हिमालय चली॥ सुना है किसी से वहाँ है प्रभा बढ़ो आज देखूँ पिया की सभा प्रकृति...

  • “गज़ल”

    “गज़ल”

    उस हवा से क्या कहूँ जो छल दुबारा कर गई रुक जला डाले महल औ दर किनारा कर गई रोशनी से वो नहाकर जब चली अपनी डगर डालियाँ थी जल रही खग बे सहारा कर गई॥...

  • “रश्मि का पाक सम्मान”

    “रश्मि का पाक सम्मान”

    आज रश्मि के खुशी का ठिकाना नहीं है, हो भी क्यों नहीं, सम्मान किसको प्यारा नहीं होता। प्रतिपल सभी यही तो चाहते हैं कि उसके कर्म का, उसके व्यवहार का, उसकी लगन की तारीफ हो, पर...

  • “रमेश छंद”

    “रमेश छंद”

    बरसत मेघा नयनन मूँद विचरत भौंरा कलियन बूँद।। मधुरम वाणी अनहद प्रीत। बिहरत प्राणी समझत रीत।। घट घट ब्यापे नवतर सोच। कलरव गूँजें नटखट चोंच।। लहरत झूला बगियन फूल। बिसरत नाही सिहरत शूल।। महातम मिश्र ‘गौतम’...