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  • “छंद मुक्तामणि, मुक्तक”

    “छंद मुक्तामणि, मुक्तक”

    विधान – 25 मात्रा, 13,12 पर यति, यति से पूर्व वाचिक 12/लगा, अंत में वाचिक 22/गागा, क्रमागत दो-दो चरण तुकान्त, कुल चार चरण, पर मुक्तक में तीसरा चरण का तुक विषम अतिशय चतुर सुजान का, छद्मी...

  • “गज़ल”

    “गज़ल”

    बह्र- 2122 2122 2122 2, काफ़िया- अर, रदीफ़- दिया मैंने क्या लिखा क्योंकर लिखा क्या भर दिया मैंने कुछ समझ आया नहीं क्या डर दिया मैंने आज भी लेकर कलम कुछ सोचता हूँ मैं वो खड़ी...

  •  “मुक्तक”

     “मुक्तक”

    मापनी- 212 212 1222 हर पन्ने लिख गए वसीयत जो। पढ़ उसे फिर बता हकीकत जो। देख स्याही कलम भरी है क्या- क्या लिखे रख गए जरूरत जो॥-1 गाँव अपना दुराव अपनों से। छाँव खोकर लगाव...

  • “कुंडलिया”

    “कुंडलिया”

    मम्मा ललक दुलार में, नहीं कोई विवाद। तेरी छवि अनुसार मैं, पा लूँ सुंदर चाँद.. पा लूँ सुंदर चाँद, निडर चढ़ जाऊँ सीढ़ी। है तेरा संस्कार, उगाऊँ अगली पीढ़ी॥ कह गौतम कविराय, भरोषा तेरा अम्मा। रखती...

  • “पिरामिड”

    “पिरामिड”

    वो वहाँ तत्पर बे-खबर प्रतीक्षारत मन से आहत प्यार की चाहत आप यहीं बैठे हैं॥-1 है वहाँ उद्यत आतुरता सहृदयिता नैन चंचलता विकल व्याकुलता-2 महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी परिचय - महातम मिश्र शीर्षक- महातम मिश्रा के...

  • “गीतिका”

    “गीतिका”

    मापनी-2122 2122, 2122 212, समांत- ओल, पदांत- दूँ, हो इजाज़त आप की तो, दिल कि बातें बोल दूँ बंद हैं कमरे अभी भी, खिड़कियों को खोल दूँ उस हवा से जा कहूँ फिर, रुख इधर करना...

  • “गज़ल”

    “गज़ल”

    बह्र- 122 122 122 122, काफ़िया- आने, रदीफ़- लगा है, यहाँ भी वही शोर आने लगा है जिसे छोड़ आई सताने लगा है किधर जा पड़ूँ बंद कमरे बताओ तराने वहीं कान गाने लगा  है॥ सुलाने...

  • ” मुक्तक”

    ” मुक्तक”

    छन्द- वाचिक विमोहा (मापनीयुक्त मात्रिक) मापनी – 212 212 दृश्य में सार है आप बीमार हैं पूछता कौन क्या कान बेकार है॥-1 आँख बोले नहीं मौन देखे नहीं पाँव जाए कहाँ सार सूझे नहीं॥-2 वेदना साथ...

  • “मुक्तक”

    “मुक्तक”

    मापनी-2122 2122, 2122 212, समांत- आने, पदांत – के लिए घिर गए जलती शमा में, मन मनाने के लिए। उड़ सके क्या पर बिना फिर, दिल लगाने के लिए। राख़ कहती जल बनी हूँ, ख्वाइसें इम्तहान...

  • “कुंडलिया”

    “कुंडलिया”

    पढ़ते-पढ़ते सो गया, भर आँखों में नींद। शिर पर कितना भार है, लगता बालक बींद॥ लगता बालक बींद, उठाए पुस्तक भारी। झुकी भार से पीठ, हँसाए मीठी गारी॥ कह गौतम कविराय, आँख के नंबर बढ़ते। अभी...