Author :

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    “कुंडलिया” कितना कर्म महान है, व्यर्थ न होती नाल सरपट घोड़ा दौड़ता, पाँव रहे खुशहाल पाँव रहे खुशहाल, सवारी सुख से दौड़े मेहनती मजदूर, स्वस्थ रहता जस घोड़े कह गौतम कविराय, कर्म फलता है इतना जितना...

  • “मुक्त काव्य” 

    “मुक्त काव्य” 

    जी करता है जाकर जी लू बोल सखी क्या यह विष पी लू होठ गुलाबी अपना सी लू ताल तलैया झील विहार सुख संसार घर परिवार साजन से रूठा संवाद आतंक अत्याचार व्यविचार हंस ढो रहा...

  • “गीतिका”

    “गीतिका”

    आधार छंद- शक्ति , मापनी 122 122 122 12, समांत- ओगे, पदांत- नहीं बनाया सजाया कहोगे नहीं गले से लगाया सुनोगे नहीं सुना यह गली अब पराई नहीं बुलाकर बिठाया हँसोगे नहीं॥ बनाकर बिगाड़े घरौंदे बहुत...

  • “गज़ल”

    “गज़ल”

    काफ़िया- आ स्वर, रदीफ़- रह गया शायद जुर्म को नजरों से छुपाता रह गया शायद व्यर्थ का आईना दिखाता रह गया शायद सहलाते रह गया काले तिल को अपने नगीना है सबको बताता रह गया शायद॥...

  • “कुंडलिया”

    “कुंडलिया”

    खेती हरियाली भली, भली सुसज्जित नार। दोनों से जीवन हरा, भरा सकल संसार।। भरा सकल संसार, वक्त की है बलिहारी। गुण कारी विज्ञान, नारि है सबपर भारी।। कह गौतम कविराय, जगत को वारिस देती। चुल्हा चौकी...

  • “मुक्तक”

    “मुक्तक”

    हिंदी सिर बिंदी सजी, सजा सितंबर माह। अपनी भाषा को मिला, संवैधानिक छाँह। चौदह तारिख खिल गया, दे दर्जा सम्मान- धूम-धाम से मन रहा, प्रिय त्यौहारी चाह॥-1 बहुत बधाई आप को, देशज मीठी बोल। सगरी भाषा बहन सम,...

  • “कुंडलिया”

    “कुंडलिया”

    कटना अपने आप का, देख हँस रहा वृक्ष। शीतल नीर समीर बिन, हाँफ रहा है रिक्ष।। हाँफ रहा है रिक्ष, अभिक्ष रहा जो वन का। मत काटो अब पेड़, जिलाते जी अपनों का।। कह गौतम कविराय,...


  • “गीतिका”

    “गीतिका”

    मापनी- 2122 2122 , पदांत- पाना, समांत- जीत, ईत स्वर प्यार खोना मीत पाना युद्ध को हर जीत पाना हो सका संभव नहीं जग पार कर हद हीत पाना॥ दिल कभी भी छल करे क्या प्रीत...

  • “गज़ल”

    “गज़ल”

    क़ाफ़िया— ई स्वर की बंदिश, रदीफ़- सादगी से रुला कर हँसाते बड़ी सादगी से गुलिस्तां खिलाते अजी सादगी से हवा में निशाना लगाने के माहिर पखेरू उड़ाते दबी सादगी से।। परिंदों के घर में नहीं मादगी...