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  • गज़ल

    गज़ल

    झूठ के सामने सच छुपाते रहे छोड़कर जा रहे क्यों पढ़ाते रहे जान लेते हक़ीकत अगर वक्त की सच कहूँ लौट आते सताते रहे।। ये सहज तो न था खेलना आग से प्यास को आब जी...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    नहीं सहन होता अब दिग को दूषित प्यारे वानी। हनुमान को किस आधार पर बाँट रहा रे प्रानी। जना अंजनी से पूछो ममता कोई जाति नहीं- नहीं किसी के बस होता जन्म मरण तीरे पानी।।-1 मानव...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    मारे मन बैठी रही, पुतली आँखें मीच। लगा किसी ने खेलकर, फेंक दिया है कीच।। फेंक दिया है कीच, तड़फती है कठपुतली। हुई कहाँ आजाद, सुनहरी चंचल तितली।। कह गौतम कविराय, मोह मन लेते तारे। बचपन...

  • छंदमुक्त काव्य

    छंदमुक्त काव्य

    तुम ही हो मेरे बदलते मौसम के गवाह मेरे सावन की सीलन मेरे मन की कुढ़न मेरी गर्मी की तपन मेरे शिशिर की छुवन मधुमास की बहार हो तुम।। तुम ही होे मेरे उम्र की पहचान...

  • भोजपुरी गीत

    भोजपुरी गीत

    साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई जाओ जनि छोड़ी के बखरिया झूले तिरई……. साँझे कोइलरिया बिहाने बोले चिरई देख जुम्मन चाचा के अझुराइल खटिया होत भिनसारे ऊ उठाई लिहले लठिया गैया तुराइल जान हेराइ गईल बछवा खोजटाते...

  • गज़ल

    गज़ल

    पास आती न हसरत बिखरते रहे चाहतों के लिए शोर करते रहे कारवाँ अपनी मंजिल गया की रुका कुछ सरकते रहे कुछ फिसलते रहे।। चंद लम्हों की खातिर मिले थे कभी कुछ भटकते रहे कुछ तरसते...

  • “मत्तगयन्द सवैया”

    “मत्तगयन्द सवैया”

    होकर मानव भूल गए तुम मान महान विचार बनाये। रावण दानव जन्म लियो नहिं बालक पंडित ज्ञान बढ़ाये।। अर्जुन नाहक वीर भयो नहिं नाहक ना दुरयोधन जायो। कर्म किताब पढ़ो नर नायक नाहक ना अहिरावण आयो।।...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    देखिए तो कैसे वो हालात बने हैं। क्या पटरियों पै सिर रख आघात बने हैं। रावण का जलाना भी नासूर बन गया- दृश्य आँखों में जख़्म जल प्रपात बने हैं।।-1 देखन आए जो रावण सन्निपात बने...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    पाया प्रिय नवजात शिशु, अपनी माँ का साथ। है कुदरत की देन यह, लालन-पालन हाथ।। लालन-पालन हाथ, साथ में खुशियाँ आए। घर-घर का उत्साह, गाय निज बछड़ा धाए।। कह गौतम कविराय, ठुमुक जब लल्ला आया। हरी...

  • छंदमुक्त काव्य

    छंदमुक्त काव्य

    कूप में धूप मौसम का रूप चिलमिलाती सुबह ठिठुरती शाम है सिकुड़ते खेत, भटकती नौकरी कर्ज, कुर्सी, माफ़ी एक नया सरजाम है सिर चढ़े पानी का यह कैसा पैगाम है।। तलाश है बाली की झुके धान...