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  • पिरामिड

    पिरामिड

    “पिरामिड” ये बीज फसल खलिहान थका किसान पहनता खाद ओढ़ता व्याज कर्ज।। है प्याज कीमती उगती है उफनती है थाली में मेवाती महँगाई मार जाती।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी परिचय - महातम मिश्र शीर्षक- महातम मिश्रा...

  • नुक्कड़ की मुलाकातें

    नुक्कड़ की मुलाकातें

    “नुक्कड़ की मुलाकात” ये झिनकू भैया भी अजीब किस्म के इंसान है, जब भी मिलते हैं गाँव के नुक्कड़ पर ही मिलते हैं। यहाँ तक तो ठीक है पर मिलते ही किसी न किसी समस्या के...

  • दोहा

    दोहा

    “दोहा” चाँद आज का मनचला, करता बहुत किलोल। लुक्का-छुप्पी खेलकर, हो जाता है गोल।।-1 साजन करवा चौथ का, है निर्जल उपवास। जल्दी लाना चाँद घर, चिलमन चलनी खास।।-2 मुखड़ा तेरा देखकर, बुझ जाएगी प्यास। साजन तुम...

  • दोहा द्वादसी

    दोहा द्वादसी

      “दोहा द्वादसी” रावण के खलिहान में, चला राम का तीर। लंका का कुल तर गया, मंदोदरी अधीर।।-1 दश दिन के संग्राम में, बीते चौदह साल। मेघनाथ का बल गया, हुआ विभीषण लाल।।-2 कुंभकरण सोता रहा,...

  • हास्य व्यंग – दोहा, मुक्तक

    हास्य व्यंग – दोहा, मुक्तक

    “दोहा” झूठ मूठ का हास्य है, झूठ मूठ का व्यंग। झूठी ताली दे सजन, कहाँ प्रेम का रंग।। “मुक्तक” अजब गजब की बात आप करते हैं भैया। हँसने की उम्मीद लगा आए हैं सैंया। महँगाई की...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    ममता के पांडाल में, माता जी की मूर्ति। नव दिन के नवरात में,सकल कामना पूर्ति। सकल कामना पूर्ति, करें आकर जगदंबा। भक्तों के परिवार में, एक मातु अवलंबा। कह गौतम कविराय, न देखी ऐसी समता। होते...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    “मुक्तक” बादल कहता सुन सखे, मैं भी हूँ मजबूर। दिया है तुमने जानकर, मुझे रोग नासूर। अपनी सुविधा के लिए, करते क्यों उत्पात- कुछ भी सड़ा गला रहें, करो प्लास्टिक दूर।। मैं अंबुद विख्यात हूँ, बरसाने...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    सूत उलझता ही गया, मुख से निकला राम। पदचिन्हों पर आज भी, मचा हुआ संग्राम। मचा हुआ संग्राम, काम का चरखा चौमुख। कात रहे सब सूत, सपूत अपनों से बिमुख। कह गौतम कविराय, नमन हे भारती...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    “मुक्तक” नौनिहाल का गजब रूप चंहका मन मोरा। बहुत सलोने गात अघात देखि निज छोरा। सुंदर-सुंदर हाथ साथ गूँजें किलकारी- माँ की ममता के आँचल में उछरे पोरा।। पोरी भी है साथ निहारे वीरन अपना। बापू...

  • मुक्तकाव्य

    मुक्तकाव्य

    “मुक्तकाव्य” वो जाग रहा है हमारी सुखनिद्रा के लिए अमन चैन के लिए सीमा की चौहद्दी के लिए और आप! अपनी ही जुगलबंदी अलाप रहें हैं निकलिए बाहर और देखिए सूरज अपनी जगह पर है चाँद!...