Author :

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    “कुंडलिया” बालू पर पदचिन्ह के, पड़ते सहज निशान। आते- जाते राह भी, घिस देती पहचान।। घिस देती पहचान, मान मन, मन का कहना। स्वारथ में सब लोग, भूलते भाई बहना।। कह गौतम कविराय, नाचता है जब...

  • चतुष्पदी

    चतुष्पदी

    “चतुष्पदी” वही नाव गाड़ी चढ़ी, जो करती नद पार। पानी का सब खेल है, सूख गई जलधार। किया समय से आप ने, वर्षों वर्ष करार- चढ़ते गए सवार बन, भूले क्यों करतार।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी...

  • सोरठा

    सोरठा

    “सोरठा” गर्मी है जी तेज, आँच आती है घर घर नींद न आती सेज, चुनावी चाल डगर में।। होगी कैसी शाम, सुबह में बहे पसीना। वोट दिलाना राम, संग में दिव्य करीना।। वादे पर है शान,...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    धू धू कर के जल रहे, गेंहूँ डंठल बाल धरा झुलसलती हो विकल, नोच रहे हम खाल नोच रहे हम खाल, हाल बेहाल मवाली समझाए भी कौन, मौन मुँह जली पराली कह गौतम कविराय, चाय सब...

  • कुंडलिया

    कुंडलिया

    चैत्री नव रात्रि परम, परम मातु नवरूप। एक्कम से नवमी सुदी, दर्शन दिव्य अनूप।। दर्शन दिव्य अनूप, आरती संध्या पावन। स्वागत पुष्प शृंगार, धार सर्वत्र सुहावन।। कह गौतम कविराय, धर्म से कर नर मैत्री। नव ऋतु...

  • छंदमुक्त काव्य

    छंदमुक्त काव्य

    “विधा-छंदमुक्त” रूठकर चाँदनी कुछ स्याह सी लगी बादल श्वेत से श्याम हो चला है क्या पता बरसेगा या सुखा देगा है सिकुड़े हुए धान के पत्तों सी जिंदगी उम्मीद और आशा से हो रही है वन्दगी...

  • छंदमुक्त काव्य

    छंदमुक्त काव्य

    “छंद मुक्त काव्य” अनवरत जलती है समय बेसमय जलती है आँधी व तूफान से लड़ती घनघोर अंधेरों से भिड़ती है दिन दोपहर आते जाते है प्रतिदिन शाम घिर आती है झिलमिलाती है टिमटिमाती है बैठ जाती...

  • “गीतिका”

    “गीतिका”

    समांत- आम, पदांत- को, मापनी- 2122 2122 1222 12 “गीतिका” डोलती है यह पवन हर घड़ी बस नाम को नींद आती है सखे दोपहर में आम को तास के पत्ते कभी थे पुराने हाथ में आज...

  • कुछ शेर

    कुछ शेर

    “कुछ शेर” बहुत गुमराह करती हैं फिजाएँ जानकर जानम आसान मंजिल थी हम थे अजनवी की तरह।। तिरे आने से हवावों का रुख भी बदला शायद लोग तो कहते थे कि तुम हुए मजहबी की तरह।।...

  • वागीश्वरी सवैया

    वागीश्वरी सवैया

    वागीश्वरी (सात यगण+लघु गुरु) सरल मापनी — 122/122/122/122/122/122/122/12, 23 वर्ण “वागीश्वरी सवैया” उठो जी सवेरे सवेरे उठो जी, उगी लालिमा को निहारो उठो। नहा लो अभी भाप पानी लिए है, बड़े आलसी हो विचारो उठो। कहानी...