गीत/नवगीत

गीत : मैंने इस संसार में, झूठी देखी प्रीत

मैंने इस संसार में, झूठी देखी प्रीत मेरी व्यथा-कथा कहे, मेरा दोहा गीत मैंने इस संसार में …. मुझको कभी मिला नहीं, जो थी मेरी चाह सहज न थी मेरे लिए, कभी प्रेम की राह उर की उर में ही रही, अपना यही गुनाह कैसे होगा रात-दिन, अब जीवन निर्वाह जब भी आये याद तुम, […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

साधना कर यूँ सुरों की, सब कहें क्या सुर मिला बज उठें सब साज दिल के, आज तू यूँ गुनगुना हाय! दिलबर चुप न बैठो, राज़े-दिल अब खोल दो बज़्मे-उल्फ़त में छिड़ा है, गुफ़्तगूं का सिलसिला उसने हरदम कष्ट पाए, कामना जिसने भी की व्यर्थ मत जी को जलाओ, सोच सब अच्छा हुआ इश्क़ की […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बाज़ार मैं बैठे मगर बिकना नहीं सीखा हालात के आगे कभी झुकना नहीं सीखा तन्हाई मैं जब छू गई यादें मिरे दिल को फिर आंसुओं ने आँख मैं रुकना नहीं सीखा फिर आईने को बेवफा के रूबरू रक्खा मैंने वफ़ा की लाश को ढकना नहीं सीखा जब चल पड़े मंजिल की जानिब ये कदम मेरे […]

कुण्डली/छंद

कुंडलिया छन्द

1.) कुण्डलिया के छंद में कुण्डलिया के छंद में, कहता हूँ मैं बात अंत समय तक ही चले, यह प्यारी सौगात यह प्यारी सौगात, छंद यह सबसे न्यारा दोहा-रौला एक, मिलाकर बनता प्यारा महावीर कविराय, लगे सुर पायलिया के अंतरमन में तार, बजे जब कुण्डलिया के (2.) जिसमें सुर-लय-ताल है जिसमें सुर-लय-ताल है, कुण्डलिया वह […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

जो व्यवस्था भ्रष्ट हो, फ़ौरन बदलनी चाहिए लोकशाही की नई, सूरत निकलनी चाहिए मुफलिसों के हाल पर, आंसू बहाना व्यर्थ है क्रोध की ज्वाला से अब, सत्ता बदलनी चाहिए इंकलाबी दौर को, तेज़ाब दो जज़्बात का आग यह बदलाव की, हर वक्त जलनी चाहिए रोटियां ईमान की, खाएं सभी अब दोस्तो दाल भ्रष्टाचार की, हरगिज न गलनी […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ग़रीबों को फ़क़त, उपदेश की घुट्टी पिलाते हो बड़े आराम से तुम, चैन की बंसी बजाते हो है मुश्किल दौर, सूखी रोटियां भी दूर हैं हमसे मज़े से तुम कभी काजू, कभी किशमिश चबाते हो नज़र आती नहीं, मुफ़लिस की आँखों में तो खुशहाली कहाँ तुम रात-दिन, झूठे उन्हें सपने दिखाते हो अँधेरा करके बैठे […]

कविता

टूटा हुआ दर्पण

एक टीस-सी उभर आती है जब अतीत की पगडंडियों से गुजरते हुए — यादों की राख़ कुरेदता हूँ। तब अहसास होने लगता है कितना स्वार्थी था मेरा अहम्? जो साहित्यक लोक में खोया न महसूस कर सका तेरे हृदय की गहराई तेरा वह मुझसे आंतरिक लगाव मै तो मात्र तुम्हें रचनाओं की प्रेयसी समझता रहा […]

कविता

महानगर में

कौन से उज्जवल भविष्य की ख़ातिर हम पड़े हैं– महानगर के इस बदबूदार घुटनयुक्त वातावरण में। जहाँ साँस लेने पर टी० बी० होने का ख़तरा है जहाँ अस्थमा भी बुजुर्गों से विरासत में मिलता है और मिलती है क़र्ज़ के भारी पर्वत तले दबी, सहमी-सहमी-सी खोखली जिंदगी। और देखे जा सकते हैं भरी जवानी में […]

कविता

विरासत

जानते हो यार मैंने विरासत में क्या पाया है? जहालत, मुफलिसी, बेरुख़ी तृषकार, ईष्या, कुंठा आदि-आदि शब्दों की निरंतर लम्बी होती सूची जो भविष्य में– एक विस्तृत / विशाल शब्दकोष का स्थान ले शायद ? तुम सोचते हो सहानुभूति पाने को गढ़े हैं ये शब्द मैंने! मगर नहीं दोस्त ये वास्तविकता नहीं है भोगा है […]

कविता

जीवनाधार

फूल नर्म, नाज़ुक और सुगन्धित होते हैं उनमें काँटों-सी बेरुख़ी, कुरूपता और अकड़न नहीं होती जिस तरह छायादार और फलदार वृक्ष झुक जाते हैं औरों के लिए उनमें सूखे चीड़-चिनारों जैसी गगन छूती महत्वकांक्षा नहीं होती। क्योंकि — अकड़न, बेरुख़ी और महत्वकांक्षा में, जीवन का सार हो ही नहीं सकता जीवन तो निहित है झुकने […]