मुक्तक/दोहा

धूप छांह के रंग

रूप सुहानी चांदनी ,दिलकश थी आवाज ,पर चिडिया को ले उडा ,चतुर सयाना बाज। सुबह रसोई जागती ,करते बरतन शोर ,अदरख वाली चाय से ,होती अपनी भोर। ठिठुर रही है जिंदगी ,मौत भरे मुस्कान ,घना कोहरा चीर के ,आओ धूप महान। अंधियारे को चीर कर ,ऊगे सूरज रोज ,चन्दा तारों की करे ,सारा दिन वो […]

लघुकथा

सपने

कुछ सपने होते हैं जो सदा अधूरे रहते हैं। मीता ने हजारों सपने देख रखे थे। वह सोचती थी शादी के बाद वो रानी बेटी बन के राज करेगी। उसकी पढाई ख़त्म हो चुकी थी। वह टाइम पास के तौर पर कम्प्यूटर का कोई कोर्स कर रही थी। तभी अचानक उसकी शादी हो गई। लड़का […]

बाल कविता

गुलाब

सबसे प्यारा फूल गुलाब ,उसके सारे शूल नवाब। उसे चाहते कितने लोग ,इसका रखता नहीं हिसाब। सुबह सुबह नहलाती ओस ,फिर देता है महक गुलाब। शिव चरणों में पाकर स्थान, बन जाता है भगत गुलाब। तितलियों को खूब रिझाता,होता है मनचला गुलाब। उपवन की शान कहलाता,भोला भाला भला गुलाब। —महेंद्र कुमार वर्मा

लघुकथा

खुशियां

मोहनजी अपनी गर्भवती पत्नी को मायके भेज कर मित्र के साथ बाजार में घूम रहे थे। वहाँ मेले का माहौल था। मोहनजी बोले -यार ये लड़कियां न हों तो बाजार फीका लगेगा। फिर वे पार्क गए। फूलों को देखकर उनके श्रीमुख से निकला –यार ये लडकियां और फूल एक समान, महक लुटाती हैं , सुन्दरता […]

गीतिका/ग़ज़ल

सत्य की जयकार होगी

सत्य की जयकार होगी ,झूठ की फिर हार होगी। हर चुनावों में सफल हो ,सत्य की सरकार होगी। झूठ के पिछलग्गुओं की ,अब धुनाई यार होगी । सत्य की अवधारणाएं ,हर जगह साकार होगी। सत्य की गोटी चलेगी ,झूठ की लाचार होगी। झूठ के हर जुल्म पर अब ,सत्य की तलवार होगी।—महेंद्र कुमार वर्मा

मुक्तक/दोहा

शुभ हो नूतन वर्ष

नया साल लो आ रहा, लेकर सुख दुख गीत,दूजों का दुख बाँट के ,दो उनको सुख मीत। कुछ को लगता है भला ,कुछ को देता पीर ,होती है नव साल की, अलग अलग तासीर। नए साल ने खोल दी ,खुशियों की दूकान ,जिसको जितना चाहिए ,ले जाओ श्रीमान। सबको सुख सुविधा मिले ,सबका हो उत्कर्ष […]

बाल कविता

नदी बहती है –बाल कविता

कल कल प्यारी नदिया बहती,चलते चलते वो कुछ कहती,झूम झूम के चलना है जीवन,पथ की बाधाएँ कभी न सहती। मेले लगते उसके तट पे ,जल उसका है अमृत धारा। लघु लघु जब धाराएं मिलती,वृहद रूप में फिर वो खिलती,चांदी जैसी चकमक करती है,जब रवि रश्मि उस पे पड़ती। प्यास बुझाती है वो हरदम जन जन […]

गीतिका/ग़ज़ल

बहार नहीं है

सच का ये संसार नहीं है,खुशियों का व्यापार नहीं है। लोग यहाँ जो कसमें खाते,खाने को आहार नहीं है। सभी चाहते प्यारी दुल्हन ,पर बेटी स्वीकार नहीं है। ख़ुशी नहीं मिलती उस घर में ,जिस घर में मनुहार नहीं है। जहाँ खड़ी नफरत दीवारें,उस घर में अब प्यार नहीं है। राख के ढेर बहुत हैं […]

बाल कविता

मिलजुल के सीखो रहना जी

ये जीवन है एक लड़ाई,इसमें होती हाथापाई। जीतोगे तो ताज मिलेगा ,हारोगे तो मिलेगी खाई। वैसे तो मिलते कम मौके, पर जब पाओ करो भलाई। खुशियों के रंगीन चमन में,आग लगाती नफरत ताई। दुनिया के मेले में अक्सर,अच्छों में भी दिखी बुराई। मिलजुल के सीखो रहना जी,इसमें सबकी होय भलाई। — महेंद्र कुमार वर्मा

बाल कविता

बाल कविता – समोसे

गरम समोसे मुसकाते हैं ,मुँह में पानी वो लाते हैं। तीन नुकीले कोनों वाले ,सबके मन को ललचाते हैं। स्वाद चरपरा उसका होता ,चटनी साथ बहुत भाते हैं। चाय समोसे जब संग आते ,महफ़िल में रंग जमाते हैं। सुबह जलेबी और समोसे,जन जन पे ख़ुशी लुटाते हैं। — महेंद्र कुमार वर्मा