कविता

निशा घनघोर अनजाना ठौर

 मैं नादान थी, कुछ परेशान थी, मन के भावों को तुमको ही अर्पित किया। चांदनी रात में, तेज बरसात में, मेंने खुद को तुम्हें ही समर्पित किया।। रेत का घर था, गिरने का डर था, बारिस का कहर बढता ही गया। बादलों की कडक, बिजली की चमक,  मेघों का तांडव चढता ही गया।। टूटा खाट […]