राजनीति

धर्म के ठेकेदार नहीं, अवाम को बेहतर व्यवस्था देने की जुगत करें!

देश की रीढ़ कृषि और भविष्य निर्माण करने वाली शिक्षा व्यवस्था दोनों की स्थिति नाजुक है। एक तरफ देश का किसान बेबश और लाचार हैं, तो दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था का भी बेडा गर्त है। ऐसे में देश तरक्की की तरफ़ कैसे राजनीति की पाठशाला के मुताबिक बढ़ रहा, यह समझ से बाहर है। देश की प्रगति […]

राजनीति

आलेख– किस तरफ़ हम बढ़ रहें, जहां समाज का प्रहरी ही सुरक्षित नहीं

कहीं कुदाल से वार हो रहा, कहीं भीड़ टूट पड़ रहीं। यहीं नहीं कहीं लाठियां भी बरस रही। यह सब देश के चारों दिशाओं में हो रहा। अब आप सब भी सोच रहें होंगे। कैसे अराजक दृश्य की परिकल्पना हम कर रहें। तो मैं पहले यह स्पष्ट कर दूं। यह दृश्य किसी जंगली जीव के […]

सामाजिक

आलेख– सिर्फ़ राजनीतिक फाइलों में ही गांवों का रंग गुलाबी है!

राजनीति और धर्म दोनों अलग-अलग है। फिर भी आज दोनों का सियासतदानों ने सम्मोहन सिर्फ इसलिए करवा दिया है, क्योंकि सत्ता पिपासा की तीव्रता राजनीति के ठेकेदारों में बढती जा रही है। आजादी के लगभग सात दशक बाद भी देश में ऐसे युवाओं की फौज पनप नहीं पा रही। जो देश और समाज को नई […]

राजनीति

लेख– गांवों की तरफ़ मोड़ना होगा विकास की धारा!

लोकतांत्रिक व्यवस्था के सात दशकों का दस्तूर रहा है। सियासतदानों की किताब का मुख्य पृष्ठ गांव, ग़रीब और किसान ही रहा है, लेकिन शायद इन तीनों की दशा में परिवर्तन नहीं आया। इन तीनों के फटेहाल पर रोना तो उस दौर का ज़िक्र करने मात्र से आ जाता है। जब यह पता चलता है, कि […]

राजनीति

लेख– जिस राह पर आज समाजवाद, उसका मूल तो ऐसा कभी न था।

लोकतंत्र में राजधर्म की बात होती है। ऐसे में हम अपनी बात की शुरुआत हम दो बिंदु के ज़िक्र से करेंगे। जो यह साबित करेगा। राजनीति में आज विचारों की कोई अहमियत नहीं रह गई है। बात हम अगर समाजवादी पार्टी के टूटने के बारें में कर रहें। तो ऐसे में बात फिर कर्पूरी ठाकुर […]

राजनीति

आलेख– अटल जी और उत्तर प्रदेश से उनका लगाव

अटल जी भारतीय राजनीति के सूर्य थे। अगर यह उपमा दी जाएं, तो शायद ही किसी का उस पर हस्तपेक्ष हो। ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उनका अमिट व्यक्तित्व ही ऐसा था। जिस पर न सत्तापक्ष कभी अंगुली उठा सका और न विपक्ष। यानि अटल बिहारी जी एक हरदिल अज़ीज राजनीतिज्ञ और क़लमकार थे। उनके इस […]

अन्य लेख

शहर में पर्यावरण को लुप्त कर रहा प्लास्टिक कचरा

हम बेहतर और सुगम जीवन की चाह रखते हैं। लेकिन हम भौतिक सुख-सुविधाओं में इतने तल्लीन होते जा रहें, कि ख़ुद के विनाश की लीला तो लिख ही रहें। साथ में प्रकृति और पर्यावरण को भी व्यापक क्षति पहुँचा रहे। मान्यताएं है, कि प्रकृति ईश्वर की दी हुई मानव को अनमोल धरोहर है। तो उसे […]

राजनीति

आलेख– राजनीतिक दांव-पेंच में फंसा वैध-अवैध का मसला

वैध और अवैध के बीच मानवीय संवेदना आकर अटकती दिख रही है। एक दृष्टिकोण से मान लिया जाएं, कि 40 लाख लोग असम में अवैध रूप से रह रहे। पर इनके यहां तक पहुँचने का दोषी कौन है। इसकी जिम्मेदारियां लेने को तैयार कौन है, आज के दौर में। फ़ैसला इसका भी होना चाहिए। सरकारें […]

सामाजिक

आलेख– महिला सुरक्षा के नाम पर कोरी लफ़्फ़ाज़ी की हद हो गई!

समाज में बच्चें हाशिए पर है, लेकिन जो बच्चें आश्रय स्थलों में रहने को बेबस और लाचार हैं। वे पहले से अकथनीय पीड़ा से प्रताड़ित हैं। विडंबना तो यह बनती जा रही। जो आश्रय गृह नया जीवन और आकाश तले खुशियों की संजीवनी देने के लिए स्थापित किए गए हैं। वे तो नरक से भी […]

राजनीति

आलेख– बढ़ती बेरोजगारी, युवा और उनपर आज की राजनीति

युवा, राजनीति और बेरोजगारी। ये तीन शब्द हिंदी भाषा में अपना-अपना अर्थ और महत्व रखते हैं। पर किसी न किसी मोड़ पर आकर अंतर्निहित होते से लगते हैं। इसके पीछे का तर्क यह है, कि युवाओं की बात राजनीति करती है, सत्ताशीर्ष तक पहुँचने के लिए। तो बेरोजगारी देश और समाज से दूर करने का […]