राजनीति

आलेख– आज़ादी के सोपान और आज का परिवेश

हम प्रति वर्ष आज़ादी दिवस मानते हैं। मनाएं भी क्यों न, इसके लिए हमारे पुरखों- पुरोधाओं ने अमिट बलिदान और सर्वस्व न्योछावर जो किया है। पर क्या थे, उनके मस्तिष्क में आज़ादी का भावार्थः, क्या हम आज उसकी अनुभूति कर पा रहें हैं। क्या हमने उनके सपनों को पर लगाया। उन्होंने हमें स्वच्छन्द और विस्तृत […]

राजनीति

कहीं अय्याशी के सुविधा गृह में तो तब्दील नहीं हो रहे बालिका संरक्षण गृह

यूँ तो संसद में महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण का मुद्दा गूंजता रहता है। महिलाओं को 33 फ़ीसद आरक्षण देने का चुनावी चक्रव्यूह भी रचा बुना जाता है। पर अब महिलाओं और बच्चियों के हिस्से में आ क्या रहा। देवरिया में संस्था का नाम विन्ध्वासिनी, लेकिन काम देखिए जो बच्चियां देवी स्वरूप होती है, उन्हें सफेदपोश […]

सामाजिक

आलेख– अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस और हमारी युवा पीढ़ी

ऐसा माना जाता है, हम बदलेंगे, तो देश बदलेगा। ऐसे में जब हमारा देश बदलेगा, तभी हम इस सम्पूर्ण धरा पर बदलाव के संवाहक बन पाएंगे। हम आज के दौर में बड़ी-बड़ी हवाई बातें करके अपने आप को सांत्वना भले दे लेते हो, कि हम वैश्विक परिदृश्य का नेतृत्व करने की दिशा में बढ़ रहे। […]

राजनीति

लेख- क्यों न हो देश-प्रदेश के मंत्रिमंडल में स्वतंत्र युवा मंत्रालय

युवा अगर देश और समाज का कर्णधार है। तो एक अदद नौकरी उसकी जरूरत। बिना नौकरी के एक युवा न अपने घर-परिवार की मदद कर सकता है, और न देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था में सहभागिता निभा सकता है। आज हम मानते हैं, कि सुनहरे भविष्य के लिए सरकारी नौकरियों की प्राथमिकता बढ़ रही। लेकिन ऐसे […]

सामाजिक

लेख– सकारात्मक दृष्टिकोण का अभाव बढ़ते सामूहिक आत्महत्या की वज़ह

हम आधुनिक हो रहें हैं। धर्म को विज्ञान चुनौती दे रहा है। हम क़सीदे भी पढ़ रहें वैज्ञानिक युग में जीने का। पर इन सब के भंवर में शायद हमारे सोचने-समझने, तर्क-वितर्क करने और आत्मचिंतन करने की प्रक्रिया को बिसार चुके हैं। पहले दिल्ली का बुराड़ी, फ़िर उसके उपरांत झारखंड का हजारीबाग और अब जाकर […]

सामाजिक

लेख– देश की अर्थव्यवस्था को बट्टा लगाते, बढ़ते आंदोलन

एक लोकतांत्रिक देश की अर्थव्यवस्था किसके पैसों पर चलती है। यह बताने की बात नहीं। आम अवाम टैक्स अदा करती है, फ़िर उसी पैसों से देश चलता है। ऐसे में जब अवाम के पैसों से ही देश की गाड़ी गतिमान होती है। फ़िर एक बात यह समझ नहीं आती, कि हिंसा और विरोध प्रदर्शन के […]

राजनीति

लेख– सुशासन बाबू के राज में सुशासन है, कहाँ?

सबके के अपने दावे होते हैं। फ़िर वह केंद्र की सरकार हो, या राज्य की रहनुमाई व्यवस्था। आज के वक्त में राजनीति में कोई सुशासन पुरुष बन बैठा है, तो कोई विकास पुरूष। पर जब कोई ज़मीनी हक़ीक़त सामने आती है। ऐसे में फिर सभी वादों और दावों की कलई खुलनी शुरू हो जाती है। […]

राजनीति

लेख– सुशासन स्थापित करने में क्यों पिछड़ रहें बड़े राज्य!

सबके के अपने दावे होते हैं। फ़िर वह केंद्र की सरकार हो, या राज्य की रहनुमाई व्यवस्था। आज के वक्त में कोई सुशासन पुरुष बन बैठा है, तो कोई विकास पुरूष। पर जब कोई ज़मीनी हक़ीक़त सामने आती है। ऐसे में फिर सभी वादों और दावों की कलई खुलनी शुरू हो जाती है। बिहार में […]

राजनीति

लेख– अविश्वास प्रस्ताव और विपक्ष की मंशा!

लोकसभा में हर मर्तबा अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का कतई मक़सद यह नहीं हो सकता, कि यह सरकार गिराने की एक प्रक्रिया हो। यह प्रचंड बहुमत से बनी राजग सरकार के खिलाफ लाए गए विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव ने भी साबित किया। देश ही नहीं वैश्विक पटल पर जहां भी लोकतांत्रिक सरकारें स्थापित होती हैं। […]

सामाजिक

लेख– ऐसे में कैसे भलीभूत होगा जीवन जीने का अधिकार

संवैधानिक ढांचे में ज़िक्र बराबरी और समान अधिकार का किया गया है। फ़िर बराबरी अवसर की समता की हो। या अन्य किसी भी तरीक़े की। जाति- धर्म, ऊंच- नीच से परे होकर सभी के एक समान हक की बात होती है। फ़िर वह चाहें शिक्षा के क्षेत्र की बात हो, नौकरी-पेशे की बात हो। पर […]