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  • मातृ भाषा

    मातृ भाषा

    मातृ भाषा चेतना चिन्तन प्रयोजन हूँ मैं तुम्हारी मातृ भाषा हूँ मैं | आधार स्तंभ परिवेश हूँ मैं तुम्हारी मातृ भाषा हूँ मैं | शब्दों का अनंत सागर समाहित है मुझमें | असीम संभावनाएँ लिपटी हैं...

  • पावस ऋतु

    पावस ऋतु

    तपन भरी थी जेठ दोपहरी, हाँफ रहे नर पशु पक्षी | झील सरोवर सूख रहे थे,प्यासी -प्यासी यह धरती | लुप्त हो गई शीतल छाया ,पवन रोक बैठा साँसे | अकुलाए सब जीव जहाँ के,राह तकें...

  • क्या करूँ

    क्या करूँ

    दूर नज़रो से नज़र है क्या करूँ आसमाँ से गुम क़मर है क्या करूँ दीद की हसरत में हूँ ज़िंदा यहाँ – ज़िन्दगानी पुरखतर है क्या करूँ दहशतों में घुट रही इन्सानियत – रूह पर ऐसा...

  • मैं और तुम

    मैं और तुम

    अप्रैल का महीना और गर्मी का ये आलम ,शीला का गर्मी के मारे बुरा हाल था | “सुनो जी ! मुझसे अब कोई काम नहीं होगा |रसोई की तरफ जाने का मन ही नहीं होता है...


  • पावस

    पावस

    पावस / सावन पावस की महिमा प्रबल ,चहुँ दिस बसी उमंग | हरी भरी धरती लगे , झरे प्रीत मकरंद || बरसे सावन बादरी , नाच रहे हैं मोर | कोयल कुहके बाग में , मन...


  • पतन

    पतन

    पतन देखी एक बूंद, निकली फेनिल सागर से | किनारे की रेत पर , छिपी थी आवरण में , मैने पूछा ! क्या डर है नश्वरता का ? जो छुपा रखा है स्वयं को , वो...

  • काल चक्र

    काल चक्र

    काल चक्र ~~~~~ क्या हो तुम ? समाहित किये हुए स्वयं में , अनेंको विशेषताओं को | सृष्टि में सबसे भिन्न- अनुभूति और भावनाओं से रहित | संवेदन हीन, अविश्वासी और उद्दंड भी , आस्था अनास्था...

  • प्रकाश की ओर

    प्रकाश की ओर

    प्रकाश की ओर बौद्धिक तत्वों से उलझती रही आव्रत्त… समझ नही पायी , संसार के भ्र्मजाल को | जहाँ सत्य है , असत्य रहना भी स्वभाविक है | एक स्वर्ण सद्रश, एक मिट्टी का ढेर |...