गीतिका/ग़ज़ल

राबता निकल आए

दिलों दिलों में जहाँ राबता निकल आये| पत्थरों में जो बसा वो खुदा निकल आये | तलाशते थे जिसे हम तमाम लोगों मे – मेरी तलाश में वो खुद कहाँ निकल आये | वफा की राह में पाँवो में कितने खार चुभे – ज़रा देखो जखम कोई हरा निकल आये | ज़ुबा पे इश्क का […]

गीतिका/ग़ज़ल

चरागे उल्फ़त जला रहा था

वफ़ा वो उनसे निभा रहा था | चरागे उल्फत जला रहा था | मुहब्बतों का चमन खिला कर वो दिल का दामन सजा रहा था | बसा था दिल की जो धड़कनों में- वो गीत हँस गुनगुना रहा था | करार दिल का तुम्ही हो मेरा – वो मुस्कराकर बता रहा था | गुलों के […]

गीतिका/ग़ज़ल

मोहब्बत

मोहब्बत से भरा दामन कभी मिटता नहीं दुआओ का असर खाली कभी जाता नहीं | फना उनकी मोहब्बत मे हुये है इस कदर मोहब्बत वो बला है कुछ समझ आता नहीं | बड़ी शिद्दत से चाहा हम किये उनको मगर मोहब्बत ने मोहब्बत को कभी पाया नहीं | मोहब्बत से भरा दामन जिन्होने सच कहे […]

लघुकथा

फूल परी (लघु कथा )

फूल परी ******** मलिका के पिता ने दूसरी शादी क्या की उसकी किस्मत ही फूट गयी । सौतेली माँ से उसकी एक बहन थी पर वो भी मलिका से सौतेला व्यवहार ही करती थी। पिता अपने होकर भी पराए हो गए थे । बेचारी दिन भर काम करती । घर से कुछ दूर एक बगीचा […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मचलना रूठना उनका मनाना अच्छा लगता है | मोहब्बत से मोहब्बत को निभाना अच्छा लगता है | मचलते ख्वाब आंखों में सितारे जगमगाते हैं – जो हों अरमान पूरे मुस्कुराना अच्छा लगता है | निगाहों ने निगाहों से कहा जो कुछ सुना हमने – निगाहें नाज़ से पलकें झुकाना अच्छा लगता है | चलाकर तीर […]

कविता

मिट्टी

*मिट्टी* सार है व्यवहार है संसार है मिट्टी | जग रचा जिससे वही आधार है मिट्टी | लहलहाती है फसल गुल मुस्कराते हैं – अन्न उगता है जहा गुलज़ार है मिट्टी | शून्य बसता है जहा वीरान हो धरती – सब उसे बंजर कहे बेधार है मिट्टी | पेट को रोटी मिले घर में उजाला […]

लघुकथा

प्रतिबिम्ब

प्रतिबिम्ब ******** विवाह के बाद विधि की सारी दिनचर्या ही बदल कर रह गयी | पढने पढाने की शौकीन विधि अब तो दिन भर घर गृहस्ती के कामों में उलझी रहती| पूरी तरह बदल चुकी थी वह ,तीन बच्चों में दिन कब निकल जाता पता ही नहीं चलता |बच्चो और गृहस्ती के के कामों ने […]

कविता

पतन

पतनदेखी एक बूंद, निकली फेनिल सागर से | किनारे की रेत पर , छिपी थी आवरण में , मैने पूछा ! क्या डर है नश्वरता का ? जो छुपा रखा है स्वयं को , वो बोली ! यह भारत वर्ष है| यहाँ की भूमि न्यारी है सारे जहाँ से | संस्कृति सभ्यता की जननी है […]

गीतिका/ग़ज़ल

नेता

नेता विकट कहानी है | करता बस मनमानी है | गरिमा को रख ताख तले अपनी धाक जमानी है | बे पेंदे का लोटा ये – आँखो में ना पानी है | अंधा गूंगा है बहरा – कोई ना इसका सानी है | कुर्सी का सब खेल यहाँ – लोकतंत्र बेमानी है | साम दाम […]

गीतिका/ग़ज़ल

आँसू (आधार छंद)

सबको धीर बंधाते आँसू सुख-दुख नीर बहाते आँसू – समदर्शी हो रीत निभाते – सच्ची प्रीत निभाते आँसू | प्यार और उपहार मिले तो – सजल नयन भर जाते आँसू | रोना – हँसना भाव समेटे – बिन बोले कहजाते आँसू | ओर – कोर में छिप कर बैठे- सरल हृदय बह आते आँसू | […]