धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

देशवासियों ने अग्निहोत्र यज्ञ के लाभों को जानने का यत्न नहीं किया

ओ३म् –विष व किटाणुनाशक प्रभाव के कारण कोरोना से बचाव में सहायक हो सकता है- संसार में ज्ञान से सम्बन्धित सबसे प्राचीन पुस्तक चार वेद हैं। इन चार वेद ग्रन्थों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद के मुख्य विषय ज्ञान, कर्म, उपासना तथा विशिष्ट ज्ञान वा विज्ञान हैं। यह चार वेद सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान […]

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हम वस्तुतः कौन हैं, क्या शरीर हैं अथवा आत्मा हैं?

ओ३म् हम अपने नाम, माता-पिता तथा आचार्य आदि के नामों व सम्बन्धों से जाने पहचाने जाते हैं। हमें स्कूलों में यह नहीं बताया जाता है कि वस्तुतः तत्वतः हम कौन हैं? हमारे पास देखने के आंखें, सुनने के लिये कान, चलने के लिए पैर, सूंघने के नासिका तथा पदार्थों का स्वाद जानने के लिये जिह्वा […]

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ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने वैदिक धर्म का पुनरुद्धार और देशोत्थान का कार्य किया

ओ३म् ऋषि दयानन्द (1825-1883) के समय में सृष्टि के आदिकाल से आविर्भूत ज्ञान व विज्ञान पर आधारित सत्य सनातन वैदिक धर्म विलुप्त हो चुका था। इसके स्थान पर देश में वैदिक धर्म का स्थान अविद्या, अन्धविश्वास, पाखण्ड, सामाजिक असमानता, पक्षपात व अन्यायपूर्ण व्यवहार तथा परम्पराओं से युक्त मत-मतान्तरों ने ले लिया था। मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, […]

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ईश्वर है और वह अनुमान व प्रत्यक्ष प्रमाणों से सिद्ध है

ओ३म् प्रायः सभी मत-मतान्तरों में ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है परन्तु उनमें से कोई ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को जानने तथा उसका अनुसंधान कर उसे देश-देशान्तर सहित अपने लोगों में प्रचारित करने का प्रयास नहीं करते। ईश्वर यदि है तो वह दीखता क्यों नहीं है, इसका उत्तर भी मत-मतान्तरों के पास नहीं […]

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ईश्वर सुयोग्य व पात्र भक्त व उपासकों की प्रार्थना स्वीकार करता है

ओ३म् मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्मों वा प्रारब्ध के अनुसार इस सृष्टि में जन्म लेता है। उसने जो कर्म किये होते हैं उनका सुख व दुःख रुपी फल उसे अवश्य ही भोगना होता है। जाने व अनजानें में मनुष्य जो कर्म करता है उसका कर्म के अनुसार परमात्मा की व्यवस्था से फल अवश्य मिलता है। […]

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सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा वेदज्ञान न देता तो अद्यावधि सभी मनुष्य अज्ञानी व असभ्य होते

ओ३म् वर्तमान संसार अनेक भाषाओं एवं ज्ञान-विज्ञान से युक्त है। इन सब भाषाओं एवं ज्ञान-विज्ञान का विकास कैसे व कब हुआ, इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक है। इन प्रश्नों का समाधान खोजने का सबको प्रयत्न करना चाहिये। हम जानते हैं कि संसार कि सबसे पुरानी सभ्यता वैदिक सभ्यता है। इस सभ्यता का आविर्भाव वेदों की […]

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ऋषिभक्त स्वामी श्रद्धानन्द जी को बलिदान दिवस पर सादर नमन

ओ३म् आज स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी महाराज का पावन बलिदान दिवस है। आज 23 दिसम्बर के दिन ही सन् 1926 को एक अब्दुल रसीद नाम के हत्यारे ने उनकी उनके निवास पर ही धोखे एवं विश्वासघात से गोली मार कर हत्या कर दी थी। इसका कारण स्वामी श्रद्धानन्द जी के आर्यसमाज की वैदिक विचारधारा का […]

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वेद और सद्धर्म की रक्षा के लिये संगठन एवं शुद्धि आवश्यक है

ओ३म् अपनी रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का धर्म व कर्तव्य है। यह रक्षा न केवल शत्रुओं से अपितु आदि-व्याधि वा रोगों से भी की जाती है। अपने चरित्र की रक्षा भी सद्नियमों के पालन से की जाती है। वेद व धर्म को खतरा किससे है? इसका उत्तर है कि जो वेद को नहीं मानते, वेद […]

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हमनें ऋषि दयानन्द के उपकारों को न तो जाना है और न उनसे उऋण होने का प्रयत्न किया है

ओ३म् महाभारत युद्ध के बाद देश का सर्वविध पतन व पराभव हुआ। इसका मूल कारण अविद्या था। महाभारत के बाद हमारे देश के पण्डित, ज्ञानी वा ब्राह्मण वर्ग ने वेद और विद्या के ग्रन्थों का अध्ययन-अध्यापन प्रायः छोड़ दिया था जिस कारण से देश के सभी लोग अविद्यायुक्त होकर असंगठित हो गये और ईश्वर उपासना […]

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ऋषि दयानन्द की संसार को देन वेदों में वर्णित ईश्वर का प्रामाणिक सत्य स्वरूप

ओ३म् यह निर्विवाद है कि मूल वेद संहितायें ही संसार में सबसे पुरानी पुस्तकें हैं। वेद शब्द का अर्थ ही ज्ञान होता है। अतः चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद ज्ञान की पुस्तकें हैं। इन चारों वेदों पर ऋषि दयानन्द का आंशिक और अनेक आर्य वैदिक विद्वानों का भाष्य वा टीकायें उपलब्ध हैं। अनेक […]