धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

हम मनुष्य कहलाते हैं परन्तु क्या मनुष्य बनने का प्रयत्न करते हैं?

ओ३म् मनुष्य स्वयं को मनुष्य कहता है परन्तु मनुष्य किसे कहते हैं, इस पर वह कभी विचार नहीं करता। हमारे वैदिक विद्वान बताते हैं कि मनुष्य को मनुष्य विचारशील तथा सत्य व असत्य का मनन करने के कारण से कहते हैं। मनुष्य के पास बुद्धि होती है जिससे वह उचित–अनुचित, सत्य–असत्य, कर्तव्य–अकर्तव्य, धर्म–अधर्म, न्याय–अन्याय, पक्षपात […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक एवं रक्षक विश्वगुरु ऋषि दयानन्द

ओ३म् वैदिक धर्म एक मात्र धर्म है और अन्य सभी संगठन व संस्थायें मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि हैं। धर्म उसे कहते हैं जिसे मनुष्य अपने जीवन धारण करें। जिससे सभी मनुष्यों की उन्नति हो तथा उन्हें धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति हो। सत्य को ही धारण किया जाता है असत्य को नहीं। सत्य […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

ईश्वर व सृष्टि को जानना और ईश्वरोपासना सब मनुष्यों का कर्तव्य

ओ३म् सभी मनुष्यों के पास परमात्मा का दिया हुआ शरीर एवं बुद्धि होती है। बुद्धि से मनुष्य संसार सहित ईश्वर, आत्मा एवं अपने कर्तव्यों को जान सकता है। संसार के लोगों को देखने पर यह अनुभव होता है कि लोग ईश्वर व सृष्टि को तो क्या स्वयं को भी भली प्रकार से जानते नहीं है। […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

हमें मनुष्य जन्म किस उद्देश्य एवं लक्ष्य की प्राप्ति के लिये मिला?

ओ३म् हम मनुष्य के रुप में जन्में हैं। हमें यह जन्म हमारी इच्छा से नहीं मिला। इसका निर्धारण सृष्टि के रचयिता परमात्मा ने किया। परमात्मा ने अपनी सृष्टि व व्यवस्था के अनुसार हमारे माता-पिता के द्वारा हमें जन्म दिया है। हमारे माता-पिता व उनके सभी पूर्वजों सहित सभी प्राणियों को भी परमात्मा ही जन्म देता […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

जीवात्मा का जन्म एक बार नहीं अपितु बार-बार होते रहते हैं

ओ३म् मनुष्य व सभी प्राणी इस मृत्यु लोक में जन्म लेते हैं। शैशवावस्था से बाल, किशोर,  युवा, सम्पूर्ति तथा वृद्धावस्था को प्राप्त होकर वह मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान ने अनेक विषयों पर अनेक गम्भीर प्रश्नों का समाधान किया है। जीवन के सम्बन्ध में विज्ञान ने […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

वेदों व वेदानुकूल शिक्षाओं के पालन से जीवन की उन्नति

ओ३म् मनुष्य जो भी कर्म करता है उससे उसे लाभ व हानि दोनों में से एक अवश्य होता है। लाभ उन कर्मों से होता है जो उसके वास्तविक कर्तव्य होते हैं। मनुष्य का प्रथम कर्तव्य अपने स्वास्थ्य की रक्षा करना है। इसके लिये समय पर सोना व जागना, प्रातः ब्राह्म मुहुर्त में 4.00 बजे जागना, […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

वैदिक सिद्धान्तों का पालन ही आदर्श मनुष्य जीवन का पर्याय है

ओ३म् संसार में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं। जो मनुष्य जिस मत व सम्प्रदाय का अनुयायी होता है वह अपने मत, सम्प्रदाय व उसके आद्य आचार्य के जीवन की प्रेरणा से अपने जीवन को बनाता व उनके अनुसार व्यवहार करता है। महर्षि दयानन्द सभी मत व सम्प्रदायों के आचार्यों से सर्वथा भिन्न थे और उनकी शिक्षायें […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी एवं सृष्टिकर्ता है

ओ३म् हम इस संसार आये और रह रहे हैं परन्तु हमें यह नहीं पता कि हम कहां से आये, हमें यहां कौन लाया व हमारे यहां लाये जाने का प्रयोजन क्या था? हमारा सामाजिक एवं शैक्षणिक वातावरण भी ऐसा है कि हमें इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते। इस कारण हम इन प्रश्नों की उपेक्षा […]

सामाजिक

आर्यसमाज को सशक्त बनाने वाले डा. सोमदेव शास्त्री के कुछ प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय कार्य

ओ३म् डा. सोमदेव शास्त्री, मुम्बई आर्यसमाज के प्रमुख एवं शीर्ष विद्वानों में हैं। आपने वैदिक आर्ष प्रणाली से विद्याध्ययन किया है। आप एक प्रभावशाली वक्ता हैं। आपका व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावशाली है। आपकी व्याख्यान शैली में पाठकों को आकर्षित करने तथा उन्हें विषय से बांधे रखने की क्षमता है। आप देश भर में आयोजित किये […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

स्वाध्याय एवं ईश्वरोपासना जीवन में आवश्यक एवं लाभकारी हैं

ओ३म् मनुष्य आत्मा एवं शरीर से संयुक्त होकर बना हुआ एक प्राणी हैं। आत्मा अति सूक्ष्म तत्व व सत्ता है। इसे शरीर से संयुक्त करना सर्वातिसूक्ष्म, सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, नित्य व अविनाशी  ईश्वर का काम है। आत्मा स्वयं माता के गर्भ में जाकर जन्म नहीं ले सकती। आत्मा को माता के शरीर में […]