कविता

तीर्थ

सौंधी हवा का झोंका मेरे आँचल में फिसल कर आ गिरा। वक्त का एक मोहरा हो गया। और फिर फ़िज़ाओं को चादर पर बैठा हवाओं को चूमता आसमानों की सरहदों में कहीं जा के थम गया। एहसास को एक नई खोज मिल गयी। एक नया वजूद मेरी देह से गुज़र गया। आसक्ति से अनासक्ति तक […]

कविता

अवशेष

वक्त खण्डित था, युगों में ! टूटती रस्सियों में बंध चुका था अँधेरे इन रस्सियों को निगल रहे थे। तब ! जीवन तरंग में अविरत मैं तुम्हारे कदमों में झुकी हुई तुम्हीं में प्रवाहित तुम्हीं में मिट रही थी तुम्हीं में बन रही थी| तुम्हीं से अस्त और उदित मैं तुम्हीं में जल रही थी […]

कविता

कविता

टेढ़े और तिरछे रास्तों पर चलती लकीरें नये, पुराने आयामों से निकल उन्हीं में ढलती ये लकीरें परिधि के किसी कोने में अटक बिन्दु को अपने तलाशती भटकती रहीं। भटकती रहीं। फिर देखा गोल सा सूरज टूट चुका था। ज़हन में भर चुके थे टुकड़े चापों में बट चुकी थी रोशनी चप्पा चप्पा। वक़्त में […]