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  • बाल कविता – मेला

    बाल कविता – मेला

    नदी किनारे लगा था मेला, सारे बच्चे मिलजुल गये घूमने | धमा-चौकड़ी सबने खूब मचाई, देखा जो हाथी बनाके साथी लगे चूमने || दही, जलेबी, पानी-पूरी, हलवा और कचौड़ी, सब बच्चों ने चख-चखकर खाई | फिर...


  • दीपोत्सव

    दीपोत्सव

    जगमग रोशन हो हर घर मिले नव आशा खील-बतासा दीपोत्सव का त्यौहार पावनपर्व दीपावली | फसलों से महका है परिवेश कृषक भाग्य जगे नई उमंग, नई तरंग थोड़े से पटाखे बस थोड़ी सी आतिशबाजी दीपोत्सव का...




  • मेरा गाँव

    मेरा गाँव

    कभी बड़ा खूबसूरत था मेरा गाँव मिलती थी बरगद वाली ठण्डी छाँव शहरों ने सीमा जब से तोड़ी गाँव की पगड़ंडियां हुई चौड़ी लग गई हवा शहर की गाँव को, तो हर चीज का होने लगा...

  • मानव हूँ

    मानव हूँ

    मानव हूँ मानवता की बात करुँगा, एक बार नहीं मैं तो दिन-रात करुँगा | बैर मेरा तम भरी काली रातों से – मैं उज्ज्वल प्रकाश की बात करुँगा || भेदभाव, आडंबर का हो विनाश, फैले जग...