गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

2122 1122 1122 22 दिल सलामत भी नहीं और ये टूटा भी नहीं । दर्द बढ़ता ही गया ज़ख़्म कहीं था भी नहीं ।। काश वो साथ किसी का तो निभाया होता । क्या भरोसा करें जो शख़्स किसी का भी नहीं ।। क़त्ल का कैसा है अंदाज़ ये क़ातिल जाने । कोई दहशत भी […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बेचैनियों का दौर बढा कर चली गयी । महफ़िल में वो बहार जब आ कर चली गयी ।। उसकी मुहब्बतों का ये अंदाज़ था नया । अल्फ़ाज़ दर्दो ग़म के छुपाकर चली गयी।। उसको कहो न बेवफ़ा जो मुश्क़िलात में । कुछ दूर मेरा साथ निभाकर चली गयी ।। साक़ी भुला सका न उसे चाहकर […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ग़ज़ल 1222 1222 1222 122 करेगा दम्भ का यह काल भी अवसान किंचित । करें मत आप सत्ता का कहीं अभिमान किंचित ।। क्षुधा की अग्नि से जलते उदर की वेदना का । कदाचित ले रहा होता कोई संज्ञान किंचित ।। जलधि के उर में देखो अनगिनत ज्वाला मुखी हैं। असम्भव है अभी से ज्वार […]

गीतिका/ग़ज़ल

जो दिल तुझसे वो तेरा मांगता है

1222 1222 122 निगाहों से हुई कोई ख़ता है । जो दिल तुझसे वो तेरा मांगता है ।। रवानी जिस मे होती है समंदर । उसी दरिया से रिश्ता जोड़ता है ।। हमारी ज़िन्दगी को रफ्ता रफ्ता । कोई सांचे में अपने ढालता है ।। तुम्हारे हुस्न के दीदार ख़ातिर । यहाँ शब भर ज़माना […]

गीतिका/ग़ज़ल

ख्वाहिशों की बेबसी है जिंदगी

2122 2122 212 जाने कैसी तिश्नगी है ज़िंदगी । ख्वाहिशों की बेबसी है जिंदगी ।। हर तरफ़ मजबूरियों का दौर है । ज़ह्र कितना पी रही है जिंदगी ।। फ़िक्र किसको है सियासत तू बता । भूख से दम तोड़ती है जिंदगी ।। दर्दो ग़म मत पूछिए मेरा सनम । बेवफ़ा सी हो गयी है […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – नारे जहाँ लगे थे कभी इंकलाब के

सब लोग मुन्तज़िर है वहाँ माहताब के । चेहरे पढ़े गए हैं जहाँ इज्तिराब के ।। छुपता कहाँ है इश्क़ छुपाने के बाद भी । होने लगे हैं शह्र में चर्चे ज़नाब के ।। दौलत के नाम पर वही भटके मिले सुनो किस्से सुना रहे थे जो मुझको सराब के ।। बदला ज़माना है या […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – रहे तू जहाँ वो फ़िज़ा चाहता हूँ

रहे तू जहाँ वो फ़िज़ा चाहता हूँ । मैं दैर-ओ-हरम का पता चाहता हूँ ।।1 तेरी खुशबुओं से मुअत्तर चमन में । महकती हुई इक सबा चाहता हूँ ।।2 मेरी चाहतों से है वाकिफ़ ख़ुदा जो । उसे क्या बताऊँ मैं क्या चाहता हूँ ।।3 है दोज़ख़ या जन्नत बताने की ख़ातिर । तेरे इश्क़ […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल -बेख़ुदी में आपको क्या क्या समझ बैठे थे हम

गुल ,सितारा ,चाँद का टुकड़ा समझ बैठे थे हम बेख़ुदी में आपको क्या क्या समझ बैठे थे हम ।। यहभी इक धोका ही था जो धूप में तुझको सराब। तिश्नगी के वास्ते दरिया समझ बैठे थे हम।। अब मुहब्बत से वहीं आबाद है वो गुलसिताँ । जिस ज़मीं को वक्त पर सहरा समझ बैठे थे […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

गर बिकी ये सल्तनत फिर क्या यहाँ रह जायेगा । चाहतें मिट जाएँगी ख़ाली गुमाँ रह जाएगा ।। छीन लेगी अब किताबें ये सियासत फ़ख्र से । नौजवां के हाथ बस तीरों कमां रह जायेगा ।। गोलियां उसने चला दी अम्न के सीने पे जब । फिर हमारे सब्र का तो इम्तिहाँ रह जायेगा ।। […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कुछ मुहब्बत कुछ शरारत और कुछ धोका रहा । हर अदा ए इश्क़ का दिल तर्जुमा करता रहा ।। याद है अब तक ज़माने को तेरी रानाइयाँ । मुद्दतों तक शह्र में चलता तेरा चर्चा रहा ।। पूछिए उस से भी साहिब इश्क़ की गहराइयाँ । जो किताबों की तरह पढ़ता कोई चहरा रहा ।। […]