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  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    सब कुछ है मेरे पास मगर बेजुबान हूँ । क़ानून तेरे जुल्म का मैं इक निशान हूँ ।। क्यूँ माँगते समानता का हक़ यहां जनाब । भारत की राजनीति का मैं संविधान हूँ ।। उनसे थी...


  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    कफ़स में ख्वाब उसको आसमाँ का जब दिखा होगा । परिंदा रात भर बेशक बहुत रोता रहा होगा ।। कई आहों को लेकर तब हजारों दिल जले होंगे । तुम्हारा ये दुपट्टा जब हवाओं में उड़ा...


  • ग़ज़ल –

    ग़ज़ल –

    फिर  लगाई आग किसने  एक कुर्सी के लिए । जल रहा है मुल्कअब मतलब परस्ती के लिए।।   जन्म ऊंची जात  में  लेना  यहाँ  अपराध   है । छीन  लेती  हक  यहां  सरकार गद्दी के लिए...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    इस  चमन  में   शजर  चन्द  ऐसे    रहे । जो  सदा   ज़ुल्म  तूफ़ाँ   का  सहते रहे।।   घर   हमारा  रकीबों   ने   लूटा   बहुत । और    वे   आईने...