गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – नारे जहाँ लगे थे कभी इंकलाब के

सब लोग मुन्तज़िर है वहाँ माहताब के । चेहरे पढ़े गए हैं जहाँ इज्तिराब के ।। छुपता कहाँ है इश्क़ छुपाने के बाद भी । होने लगे हैं शह्र में चर्चे ज़नाब के ।। दौलत के नाम पर वही भटके मिले सुनो किस्से सुना रहे थे जो मुझको सराब के ।। बदला ज़माना है या […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – रहे तू जहाँ वो फ़िज़ा चाहता हूँ

रहे तू जहाँ वो फ़िज़ा चाहता हूँ । मैं दैर-ओ-हरम का पता चाहता हूँ ।।1 तेरी खुशबुओं से मुअत्तर चमन में । महकती हुई इक सबा चाहता हूँ ।।2 मेरी चाहतों से है वाकिफ़ ख़ुदा जो । उसे क्या बताऊँ मैं क्या चाहता हूँ ।।3 है दोज़ख़ या जन्नत बताने की ख़ातिर । तेरे इश्क़ […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल -बेख़ुदी में आपको क्या क्या समझ बैठे थे हम

गुल ,सितारा ,चाँद का टुकड़ा समझ बैठे थे हम बेख़ुदी में आपको क्या क्या समझ बैठे थे हम ।। यहभी इक धोका ही था जो धूप में तुझको सराब। तिश्नगी के वास्ते दरिया समझ बैठे थे हम।। अब मुहब्बत से वहीं आबाद है वो गुलसिताँ । जिस ज़मीं को वक्त पर सहरा समझ बैठे थे […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

गर बिकी ये सल्तनत फिर क्या यहाँ रह जायेगा । चाहतें मिट जाएँगी ख़ाली गुमाँ रह जाएगा ।। छीन लेगी अब किताबें ये सियासत फ़ख्र से । नौजवां के हाथ बस तीरों कमां रह जायेगा ।। गोलियां उसने चला दी अम्न के सीने पे जब । फिर हमारे सब्र का तो इम्तिहाँ रह जायेगा ।। […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कुछ मुहब्बत कुछ शरारत और कुछ धोका रहा । हर अदा ए इश्क़ का दिल तर्जुमा करता रहा ।। याद है अब तक ज़माने को तेरी रानाइयाँ । मुद्दतों तक शह्र में चलता तेरा चर्चा रहा ।। पूछिए उस से भी साहिब इश्क़ की गहराइयाँ । जो किताबों की तरह पढ़ता कोई चहरा रहा ।। […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर इक सू से सदा ए सिसकियाँ अच्छी नहीं लगतीं । सुना है इस वतन को बेटियां अच्छी नहीं लगतीं ।। न जाने कितने क़ातिल घूमते हैं शह्र में तेरे । यहाँ कानून की खामोशियाँ अच्छी नहीं लगतीं ।। सियासत के पतन का देखिये अंजाम भी साहब । दरिन्दों को मिली जो कुर्सियां अच्छी नहीं […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सवालों का तो मंजर है अभी तक l कोई मुखिया निरुत्तर है अभी तक ।। उसे इल्जाम का डर है अभी तक । कहीं सच्चा सुख़नवर है अभी तक ।। ग़रीबी और बढ़ती जा रही है । यहाँ आबाद अंतर है अभी तक ।। वहाँ भी देखिए साहब दिवाली । जहां इंसान बेघर है अभी […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

दरिया में उतर आए मियां जुल्म के डर से । पानी न गुज़र जाए कहीं आपके सर से ।। लगता है मेरे गांव में जुमलों का असर है ।। भटके मिले कुछ लोग शराफ़त की डगर से ।। कातिल हुई है भीड़ यहां मुद्दतों के बाद । निकलो न अकेले ही कहीं रात में घर […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कीजिये मत अभी रोशनी मुख़्तसर ।। आदमी कर न ले जिंदगी मुख़्तसर । इश्क़ में आपको ठोकरें क्या लगीं । दफ़अतन हो गयी बेख़ुदी मुख़्तसर ।। नौजवां भूख से टूटता सा मिला । देखिए हो गयी आशिक़ी मुख़्तसर ।। गलतियां बारहा कर वो कहने लगे । क्यूँ हुई मुल्क़ में नौकरी मुख़्तसर ।। कैसे कह […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

अब न चहरे की शिकन कर दे उजागर आइना । देखता रहता है कोई छुप छुपा कर आइना ।। गिर गया ईमान उसका खो गये सारे उसूल । क्या दिखायेगा उसे अब और कमतर आइना ।। सच बताने पर सजाए मौत की ख़ातिर यहां । पत्थरो से तोड़ते हैं लोग अक्सर आइना । आसमां छूने […]