गीत/नवगीत

देख ये पर्यावरण मर रहा है

मत काट ये झाड़ पेड़ उन्होंने तेरा क्या बिगाड़ा है तेरे जन्म से तेरे अंत तक बस उनका ही सहारा है तुझे सांसे देने वाला वो अंतिम सांसे भर रहा है अब तो रुक जा मानव देख ये पर्यावरण मर रहा है कल कल करती नदिया को क्यों अपनी माता कहता है मत भूल उन्हीं […]

कविता

मासूम का शिकार

मेरी कलम भी रो पड़ी है, उसका दर्द बताने में जो कल तक तो थी जिंदा, पर अब ना रही जमाने में उसकी ऐसी क्या गलती थी, जो भेड़ियों का आहार बनी वो तो पशुओं की रक्षक थी, पर पशुओं का शिकार बनी उस दिन उसको देर हो गई थी, अपने घर को जाने में […]

कविता

वो और मैं..

वो कोमल फूल के जैसी है, मैं निम्म तेज सा orna हूं, वो सबको बहुत लुभाती है, मैं बस घायल हो जाता हूं … वो जंगल की इक मैना है, मैं पिंजरे वाला तोता हूं, वो खुले विचारों वाली है, मैंने किया हुआ समझौता हूं … वो रात पूर्णिमा वाली है, मैं दिन का घोर […]