कविता

कविता – दुख

कैसी बेटी कैसे बेटे । अगर माँ बाप रोते।। माँ बाप के दुख  । सारे रिश्तेदार चुप ।। हर व्यक्ति मजे लेता है । कौन किसी का होता है ।। तुझे भी बुढापा आएगा । बता फिर कहाँ जाएगा ।। पल पल घट रही है उम्र । चल मिलकर करते है शर्म ।। रोटी रोटी […]

कविता

कलम की व्यथा

आँखे छुपा लू कैसे । मुझे सब दिखता है ।। आईने की तस्वीर के पीछे क्या है मुझे सब दिखता है ।। क्यों रोती है माँ । मुझे सब दिखता है ।। क्यों अकेले में पिता रोता है । मुझे सब दिखता है ।। नजर बचाकर बेटा सोता है कमरे में । मुझे सब दिखता […]

कविता

समय का पहिया

समय का पहिया टिक टिक कर के धीरे धीरे चलता है । जीवन पथ है आग का दरिया और अंगारो पर चलना है ।। बैठ नही तू थक कर,देख उसे जो एक पैर पर चलता है । शरीर से अधूरा है वो पर अपनी मेहनत से चलता है ।। जब भी लगे हार का अंधेरा […]

कविता

दर्द देकर पता नही हमदर्द मेरा कहाँ गया

कभी उसने पुकारा ही नही पलटकर हमे, हम बस यूँ ही उसे जाते हुए निहारते रहे, हर वक्त साथ चलने के वादे किए थे उसने अर्थी वादों की अपने आप उठा कर चले गए, ज़माने से कहते थे जो बहुत चाहते है हमे, जमाने के लिए हमे मजाक बना कर चले गए खुशियो से जिसने […]

कविता

लो बेच दिया जमीर

बाजार मे खुद ही अपना ईमान बेचकर। कल रात नींद ना आयी अपना अभिमान बेचकर ।। बस अब मेले में नजर मैं ना आऊंगा । जो मैं था वो ना बचेगा तो खुद से नजरे कैसे मिलाऊँगा ।। अपने लिए अब मक्कारियों का नकाब बनाऊंगा। मर गया जो मैं,अब उस पर लगाऊंगा।। फरेब जो अंतरात्मा […]

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माँ

माँ के सम्मान में क्या कहूँ, ये शब्द अपने आप मे सम्माननीय है, कभी मेरे दर्द से जो दुखी हुई वो सिर्फ माँ थी, हमेशा साथ थी मेरे,चाहे मैं बड़ा था या बच्चा था, माँ जब मेरे पास थी वो जमाना बड़ा अच्छा था, कभी उफ्फ ना कि जिसने मेरे किसी भी काम को, वो […]

कविता

नीर हुआ गंभीर

सबके अपने दर्द है सबके अपने नीर । क्यों तू अपने दर्द पर नीर हुआ गभीर ।। मतलबी के दिल मे कब था तेरा दर्द । जिससे उसका काम बने बस उसी के लिए उसके नीर ।। नाटक ऐसे कर रहा जैसे हर लेगा सारे पीर । समय जरूरत का पड़े तो निकल गए उसके […]

कविता

कविता – कोई मंजिल नही

रोशनी है हर तरफ मगर दिखता कुछ भी नही। चल रहा हूँ बहुत तेज मगर मंजिल कहाँ पता नही।। जाने ये थके कदम कब रुक जाएंगे पता नही। थकान है चलने की बहुत पर मैं पहुचा कही नही।। प्यास लगी है बहुत पर पानी की एक बूंद भी पास नही। जी रहा हूँ पर जीते […]

कविता

कविता – गुनाह

कुछ इस कदर अपने गुनाहों का हिसाब रखता हूँ, एक आईना पीछे और एक आईना सामने रखता हूँ, सभी गुनाहों मैं कुछ गुनाह मेरे छूट ना जाये, इसलिए आईने अपने दाये- बाये भी रखता हूँ, वो जो ऊपर बैठा है गिनता रहे मेरे सारे गुनाह, इसलिए सर के ऊपर खुला आसमान रखता हूँ, ना वो […]