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  • शिव स्तुति (मनहरण कवित्त)

    शिव स्तुति (मनहरण कवित्त)

    आशुतोष वर देते, सारी पीड़ा हर लेते, सुरासुर देव शिव, सर्वहितकारी है | तन पे लगाएं भस्म, शिखर सजाएं चन्द्र, बाघम्बरधारी शिव, अतिमनोहारी है | गले फणी माल सोहे, नयन विशाल मोहे, त्रिनेत्र त्रिलोकपति, ये त्रिशूलधारी...

  • सत्य रवि

    सत्य रवि

    सत्य दुबक कर बैठा मन में, झूठ फैलता जाता है | काले को सफेद करने में, लगे हुए अधिवक्ता है | बिन पैरों के झूठ आखिर कितनी दूर चल पाता है? थक हारकर एक न एक...

  • शर्म की परिभाषा

    शर्म की परिभाषा

    वाह रे नई पीढी तूने तो शर्म की परिभाषा ही बदल दी सादगी, सादापन बन गया गवारपन धीरे-धीरे हो रहे हैं सभी संस्कार दफन रिश्ते नाते बोझ बन गए अजनबी भी अब तो दोस्त बन गए...

  • “रिश्ते”

    “रिश्ते”

    अजीब सा बंधन है ये रिश्ते एक नाजुक सी डोर से जुड़े हुए बड़े-बड़े रिश्ते बहुत सरलता से जुड़ जाते, बमुश्किल निभाएं जाते रिश्ते अरमानों का गला घोंटकर आगे बढना पड़ता है सब जानकर भी कभी-कभी...

  • कविता : आज निश्शब्द हूँ मैं

    कविता : आज निश्शब्द हूँ मैं

    आज निश्शब्द हूँ मैं मासूम बच्चियों की चीखती, चिल्लाती अपना हक माँगती गूँजों से कहीं गड्ढों में कहीं नालियों में, कहीं कचरों में कहीं झाड़ियों में मासूमों को रोते बिलखते देख आज निश्शब्द हूँ मैं… कहाँ...


  • कविता : अशान्त मन

    कविता : अशान्त मन

    द्वेषाग्नि में जलता हुआ, हर वक्त चिंता, तनाव में रहता है, जो न मिला उसका गम है, जो मिला वो बहुत कम है, दिल में कई शिकवे गिले हैं दुनियादारी में फंसकर, बाह्य आडम्बर कर रहा,...

  • मुक्तक

    मुक्तक

    निशाना साध मंजिल पर,नजर को तू गढ़ाए रख | तमोमय रात है काली, जरा दीपक जलाए रख | मधुप छोटे परों से भी, गगन में उड़ रहे ऊँचे | सुलगती हसरते दिल में, सदा ही तू...

  • घनाक्षरी : मन बावरा

    घनाक्षरी : मन बावरा

    मन को मरोड़ तोड़, विषयों को पीछे छोड़, मन को बनाके दास, मन पर राज कर | मन सदा भरमावें, उद्देश्यहु आड़े आवे, मन का दमन कर, पूर्ण सारे काज कर | राह भटकावें मन, यूँ...