कविता

बैठी कर के सोलह शृंगार देखो

बैठी कर के सोलह श्रृंगार देखो रूप सलोना मन के उमंग देखो कजरारे आंखो से लज्जा झलकता है होठ के लाली से मधुर मुस्कान टपकता है हाथ में जो रच गये हैं मेहंदी लाये गहरा रंग पिया के नाम की खनके चूड़ी चमके बिंदिया पिया के इंतज़ार में गायब हुई निंदिया टिका नथिया झुमका गजरा […]

कविता

तुम बदल गयी हो

तुम बदल गयी हो यही कहते हैं न लोग तो सुनो हाँ मै बदल गयी हूँ जो सूर्य अस्त होते ही अकेले घर से आँगन में निकलने से डरती थी आज आधी रात को पूरे शहर तक छान मारती हूँ हाँ मै बदल गयी हूँ जो रात में बिन माँ के सोती नहीं थी आज […]

कविता

आज समझ आया

आज समझ आया क्या होता है अपना और पराया जिसे अपना समझ जीती थी अंधविश्वास मे एक पल में टूट गया ये भ्रम समझा गया जीवन का एक सच यहां लग जाती है बोली हर एक रिश्तों की कोई मोल भाव नहीं बस एक दाम ओ है बस मतलब। निवेदिता चतुर्वेदी

कविता

नहीं लिखना मुझे अब

नहीं लिखना मुझे अब कोई कविता या कहानी लिखने से क्या फायदा जब डायरी मे ही सिमट कर रह जाते हैं और फेसबूक वाट्सएप्प खेलकर अपने मे खुश हो जाते हैं नहीं पहुंच पाता एक बेटी का दर्द उस न्यायालय में जहां उसे न्‍याय मिलें तड़पती है कराहती है तिल तिल मरती हैं एक पल […]

कविता

ए चाँद

ए चाँद सच सच बताना तुम इतने सुंदर क्यो हो? पता है मै जब भी उदास होती हूँ अपने खिड़कियों से एक टक तुम्हें निहारती हूँ तुम्हे देखने मे जो सुकून मिलता है सच मे ऐसा सुकून कहीं नहीं मिलता कुछ पल के लिए ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे तरह ही कोई मेरे जीवन मे […]

कविता

आमो के डाल पर कोयल का बसेरा

आमो के डाल पर कोयल का बसेरा चारो तरफ पेड़ो के बीच अपना एक प्यारा सा आसियाना सुबह कोयल के प्यारी सी कुंक के साथ अलसायी नींदो को झकझोर झट से उठ जाना सूर्य की किरणे मेरी खिड़कियों से होकर पूरे घर को रौशन कर जाना चाय के दो प्याली के साथ मेरा तुम्हारा बैठ […]

कविता

कही खो से गए हैं..

कहीं खो से गए हैं वो हँसी वो लम्हे वो दोस्ती वो प्यार वो अपनापन वो तकरार कहाँ कहाँ नहीं ढूंढी लाख ढूंढने पर भी नहीं मिलें थक हार बैठ गयी एक कोने में तभी याद आया मै कितनी पागल हूँ वो सब ढूंढ रही जो अब हैं ही नहीं वो हँसी वो लम्हे वो […]

कविता

पलको तले न जाने कितने ख्वाब पल रहे थे

पलको तले न जाने कितने ख्वाब पल रहे थें दिल मे न जाने कितने अरमान मचल रहे थें नित्य आगे बढ़ने की होड़ में सबको चुप चाप समेटे बढ़ती जा रही थी और हाँ वह सुन्दर थी सुशील थी प्रिय मानमोहिनी बेबाक सी चंचल थी कुछ करने को स्वतंत्र थी अपने आप में मजबूत और […]

बाल कविता

बिल्ली मौसी

बिल्ली मौसी बिल्ली मौसी कहो कहाँ से आयी हो थकी हारी सी तुम दिख रही कही जोरो से भूख नहीं तो आयी है दूध को चट करने वाली दही भी नहीं तुम छोड़ती हो आज क्यू इतनी सराफत से चुप चाप तुम बैठी हो चूहो को परेशान कर देती सबको हैरान कर देती दबे पांव […]

कविता

पुलवामा मे हुए हमले का बदला कुछ इस तरह लो

पुलवामा में हुए हमले का बदला कुछ इस तरह लो अपने ही घरो मे छुपे गद्दारो को सबसे पहले निकाला दो बहुत खोयी हमारी माताओ ने अपने वीर सपूतों को अब तुम मार भगाओ एक – एक गद्दारों को पुलवामा ही नहीं पठानकोट, उरी न जाने कितने हमले हुए हर बार की भांति सब इस […]