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  • खानाबदोश

    खानाबदोश

    आदमी होता  खानाबदोश, गर घर नही होता। फिरता  आवारा सा, गर  हमसफ़र नही होता। कोई भी सफ़र  तँन्हा तो  मुकम्मल नही होता, न हो साथ  कोई ,वो  सफ़र  सफ़र नही होता। नदी की तिश्नगी ही सागर...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    दिन को दिन, रात को रात लिखता हूँ। क्या बुरा है गर सच्ची बात लिखता हूँ। बहुत है गुलों की तारीफ करने वाले, मैं इन काँटों के जजबात लिखता हूँ। मैं समय हूँ, मुझ को है...

  • ग़ज़ल – साजिशें

    ग़ज़ल – साजिशें

    अंधेरों ने  की है  साजिशें, मिल  के  हवाओं के साथ। दिया हूँ जलता  रहूँगा, दोस्तों की  दुआओं  के साथ। हो   के   रहेगा   बरबाद,  अब   दिल   का  अंजुमन, बर्क की  अदायें  भी है, जुल्फों की घटाओं के...


  • रक्षा पर्व

    रक्षा पर्व

    ये पावन   उत्सव   नेह   का, रक्षापर्व  आया है। रेशम  की  डोर  से   लिपटा , रक्षापर्व  आया है। सावन   की   पुरवाई   में   डोले  है  मन  बावरा, सखियों संग, हम  झूले झूला, रक्षापर्व आया है। बिटिया   है  पराई...



  • बसेरा

    बसेरा

    कहीं हिन्दुओं का, कहीं बसेरा मुसलमानों का। मैं तो समझा था यारब, ये शहर है इन्सानों का। कभी चहकती थी बुलबुलें, दरख्तों की शाखों पे, अब है हदे निगाह, जंगल, पत्थर के मकानों का। हर जानिब...