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  • पगडण्डीयाँ

    पगडण्डीयाँ

    काश के सपनों के गांव में होतीं पगडण्डीयाँ। पांव पांव चलते और पा लेते खुशीयाँ। पर्वत पर्वत फूल खिलाते होते साथ साथ, चांदनी को समेटे हम करते अठखेलियाँ। गहरे पानी में मोती मिलेंगे धीरज न खोना,...

  • गुमराह

    गुमराह

    जो थे गुमराह कभी वही राहबर बन गये। तमाम फूल जिंदगी के पत्थर बन गये। दूर तलक दरख़्तो के साये नही, बुलबुलों की मीठी सदाएं नहीं, मीलों तक बस पत्थरों के घर बन गये। ये कैसा...

  • दीपशिरवा

    दीपशिरवा

    भोर तक उजालों के उपहार बांटती रही पागल पवन से न घबराई दीपशिखा। रुठे मन का अवसाद न जाने कहां खो गया मेंहदी रचे हाथों ने जब जलाई दीपशिखा। मन में नन्ही नन्हीं उमंगों के गीत...

  • माँ

    माँ

    समय की तेज धारा में खो दिया, वो सौगात वो दौलत याद आती हैं। अकसर तन्हाँ तन्हाँ रातों में मुझको माँ तेरी प्यारी  सूरत याद आती हैं घर देरी से अाने पर वो डाँटना तेरा पापा...




  • खानाबदोश

    खानाबदोश

    आदमी होता  खानाबदोश, गर घर नही होता। फिरता  आवारा सा, गर  हमसफ़र नही होता। कोई भी सफ़र  तँन्हा तो  मुकम्मल नही होता, न हो साथ  कोई ,वो  सफ़र  सफ़र नही होता। नदी की तिश्नगी ही सागर...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    दिन को दिन, रात को रात लिखता हूँ। क्या बुरा है गर सच्ची बात लिखता हूँ। बहुत है गुलों की तारीफ करने वाले, मैं इन काँटों के जजबात लिखता हूँ। मैं समय हूँ, मुझ को है...