कविता

माटी की हांड़ी

माटी की हांडी *************** जरा सी आग बची थी चूल्हे में तो सोचा क्यों इस तपत को बेकार जाने दूँ मन तो अनमना सा था फिर भी उठी, भूतकाल की अँधेरी गुफाओं से उठा कर लाई एक माटी की हांडी चढ़ा तो दी चूल्हे पर पर अब सोचा इसमें पकाऊं क्या? शून्य में ताकती रही, […]

कविता

कविता : भीगा सावन

बहुत भीगा सावन है रे दिल को सुखा रख आँखों को भीगा गया पल – पल जुदाई में तड़पती को और मछली सा तडपा गया अब सावन है तो हर अक्षर भीगेगा इस गीले कागज़ को फिर कैसे निचोड़ेगा यादों की छत पर तन्हाई जमकर बरसेगी आँचल भिगोकर दामन सुखा रखेंगी पुरवाई जब तेरा बदन […]

कविता

कविता : मेरे सपनों का गाँव

आ री निंदिया हाथ पकड़ मुझे अपने साथ ले चल मेरे सपनों के मुझे तू गाँव ले चल जहाँ बादल रुई के फोहे बन उड़ते हों चाँद और सूरज आँख मिचौली खेलते हों पुरूवाई में प्रेम की सुगंध बहती हो धरती जहाँ की देश-भक्त पैदा करती हो गायों के गले में सोने के घुंघरू बजते […]