Author :

  • कविता

    कविता

    घोड़े दौड़ते थे बड़ी तेज़ी से दिल के। न अस्तबल का पत्ता था और न रस्तों का। उसकी आँखों के झरने सुर्ख़ होठों की गर्माहट प्यास और थकान को भगा देती थी। हर पल गुफ़्तगू करनी...

  • वो काले साये

    वो काले साये

    हजारों सालों पहले आएं हमारी भूमि पर वे असलों से लैस होकर मंडराएं हमारे खेतों, घरों, मैदानों और पहाड़ों पर। फूलों के खिलनें से पहले, पंछियों के चहकनें से पहले, रौंद दी गई पत्तियाँ, सील दी...

  • राम और रहीम

    राम और रहीम

    दहकती धरती को देखकर, लाशों के ढेर की गिनती करते रो रहे है, राम और रहीम कल अचानक बवाल उठा, बिच चौराहे पर लड़ पड़े दो इंसान, भीड़ की संख्या बढ़ने लगी जनता दो धड़ो में...

  • कविता

    कविता

    मदहोशी का आलम छा रहा है, दिल के दरिया में भूचाल आ रहा है! हमारी हस्ती कुछ भी नही, फिर जाने क्यों तलबगारो का सैलाब आ रहा है? मैं डूब रहा हूँ शब्दों की गहराई में,...

  • गीत-आखिर-क्या-मजबूरी-थी?

    गीत-आखिर-क्या-मजबूरी-थी?

    आखिर-क्या-मजबूरी-थी? तेरे इश्क की आरजू-ए-उल्फ़त में, दिल की दिलकशी में बेदर्दी जरूरी थी! आखरी तेरी क्या मजबूरी थी? मदहोशी तेरी मुहोब्बत की, आँखों के रस्ते बहनी भी जरूरी थी, आखिर तेरी क्या मजबूरी थी? हद से...

  • मैं किसान हूँ!

    मैं किसान हूँ!

    देश की आन ,बान और शान हूँ, हाँ! मैं किसान हूँ! चीर कर सीना धरती का, महकती फसल का सम्मान हूँ! भूमिपुत् हूँ मैं, हाँ! मैं ही सृष्टि का पञ्च प्रधान हूँ! पालक हूँ संसार का,...

  • तड़फती इंसानियत

    तड़फती इंसानियत

    जमाने की हवाओ से टूट चुके है वे पेड़, जो कभी तूफानों के तेवर गिरा दिया करते थे! मानवीय सवेंदनाओ का कत्ल वर्तमान परिस्थितियों में सबसे अधिक देखने को मिलता है! आखिर हम धीरे धीरे अपने...