सामाजिक

परिवार एवं विद्यालय पुस्तक पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा दें

लेख की शुरुआत मैं मनोशिक्षाविद् विलियम हाॅल के एक वाक्य से करता हूं जिसमें वह कहते हैं कि यदि हम बच्चों को बोलना सिखाते होते तो वे शायद कभी बोलना नहीं सीख पाते। इस वाक्य के एक सिरे को पकड़ कर यदि हम स्कूलों में बड़ों द्वारा सिखाये जा रहे ‘पढ़ना’ का संदर्भ ग्रहण करें […]

पुस्तक समीक्षा

सफ़र हमारे : स्वप्न और यथार्थ से रूबरू कराते रोमांचक यात्रा वृत्तांत

“सूखा ताल नीचे गहरी खाई में था। उसके साथ-साथ ही पहाड़ की यह खड़ी दीवार थी, जिसके किनारे पर खड़े होने की हिम्मत नहीं की जा सकती थी। पहाड़ के टूटने की आवाजें दहशत भर देने वाली थीं। कच्चे पहाड़ में अटके हुए पत्थरों पर टिकी निगाहें..पत्थर अब गिरा कि तब। जहां चल रहे थे, […]

पुस्तक समीक्षा

छूटा पीछे पहाड़ : स्मृतियों के वातायन से आता शीतल पवन का झोंका

 साहित्य की विविध विधाओं में संस्मरण, यात्रावृत्त एवं आत्मकथाएं पाठकों को बहुत लुभाती रही हैं। कारण कि हर कोई अपने प्रिय लेखक के जीवन और तत्कालीन देश समाज के जीवन को देखना-समझना चाहता है। एक लेखक के पास ही वह हुनर एवं कला कौशल होता है कि वह पाठक को घर बैठे अतीत की यात्रा […]

सामाजिक

नवीन शोधों के साथ परम्परा का पथ अपनाने का समय

भारत में ज्ञान संस्कृति की सम्पदा श्रुत परम्परा में सुरक्षित, संरक्षित एवं जीवित रही है। इसीलिए वेदों एवं अन्य आर्ष ग्रन्थों को श्रुति संज्ञा से अभिहित किया गया। पीढ़ी दर पीढ़ी यह ज्ञान कोश न केवल सुन-सुनाकर हस्तान्तरित होता रहा है बल्कि कहीं अधिक समृद्ध भी होता रहा है। किसी समाज की चिरन्तरता एवं वैचारिक […]

गीतिका/ग़ज़ल

जीवन जल निकलेगा

संकट संबल निकलेगा। भाई का बल निकलेगा। पत्थर की कारा से अब, जीवन रस जल निकलेगा।। सब अपने, कौन पराया। मन निर्मल, छल निकलेगा।। कल छोड़ो, कल की सुध लो रो मत काजल निकलेगा।। भालू का बना बिजूका। डर मत कंबल निकलेगा।। सड़कों पर गायें मरतीं। न गोभक्त दल निकलेगा।। चिंतन से हर सवाल का। […]

गीतिका/ग़ज़ल

स्वारथ के रिश्ते-नाते

प्रेम सने दो बोल कबीरा। होते हैं अनमोल कबीरा।। दुखी-उदासी की बेला में। देते चीनी घोल कबीरा।। बिछड़े संगी मिल जाते हैं। धरती बिल्कुल गोल कबीरा।। स्वारथ के सब रिश्ते-नाते। अब तो आंखें खोल कबीरा।। वाणी से मोती, युद्ध यहां। जिह्वा अपनी तोल कबीरा।। कंगूरों की चमक न देखो। नींव खोखली, पोल कबीरा।। मानवता की […]

भाषा-साहित्य

विश्व रंगमंच दिवस – रंगमंच को संवारने के संकल्प का दिन

नाटक दर्शकों को प्रेम, रहस्य, रोमांच, हर्ष, खुशी, आत्मीयता और सौंदर्य की उस ऊंचाई पर ले जाता है जहां वे कल्पना लोक में विचरण कर रहे होते हैं जो खुरदुरे पठारी यथार्थ से परे एक अलग दुनिया होती है। नाटक के मंचन से उद्भूत रस प्रेक्षागृह में उपस्थित दर्शकों को आत्मानंद की प्राप्ति कराने में […]

सामाजिक

सूने हैं पनघट और प्यासे हैं पोखर-ताल

संस्कृत वांग्मय का आंगन जल-महात्म्य के श्लोंको-ऋचाओं से परिपूर्ण है। आप: वंदे मातरम् कह कर प्राणिमात्र के पोषण के लिए जल को माता की भूमिका में स्वीकार कर श्रद्धा एवं सम्मान अर्पित किया गया है। लोक जीवन में जल एक देवता के रूप में वरुण पूजित एवं अर्चित हैं। हिंदू परम्परा में जन्म से मृत्यु […]

पर्यावरण

मानव जीवन की बेहतरी के लिए गौरैया संरक्षण आवश्यक

आज से एक दो-तीन दशक पूर्व तक हमारे घरों में एक नन्ही प्यारी चिड़िया की खूब आवाजाही हुआ करती थी। वह बच्चों की मीत थी तो महिलाओं की चिर सखी भी। उसकी चहचहाहट में संगीत के सुरों की मिठास थी और हवा की ताजगी का सुवासित झोंका भी। नित्यप्रति प्रातः उसके कलरव से लोकजीवन को […]

पुस्तक समीक्षा

रोचक एवं मनमोहक संस्मरणों की पोटली है स्मृति की खिड़की

एक पाठक के तौर पर संस्मरण मुझे हमेशा आकर्षित करते रहे हैं। एक तो यही कि संस्मरण पढ़कर सम्बंधित व्यक्ति के स्वभाव, प्रकृति, व्यक्तित्व एवं कर्म कौशल से परिचय होता है वहीं दूसरे यह कि एक संस्मरण में ही कहानी, यात्रा वृत्तांत, जीवनी, रेखाचित्र विधाओं के रस का स्वाद भी मिल जाता है। वास्तव में […]