राजनीति

राष्ट्र-साधना का बीजमंत्र: वंदेमातरम्

म0प्र0 के सरकारी कार्यालयों में प्रत्येक महीने की पहली तारीख को पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के समय से चल रहीे वंदेमातरम के सामूहिक गायन की परम्परा को नई सरकार द्वारा रोक देने की घटना को पूरे देश में अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के रूप में देखा जा रहा है। आमजन के साथ ही राजनीतिक दलों, खासकर भाजपा […]

राजनीति

राष्ट्र-साधना का बीजमंत्र: वंदेमातरम्

म0प्र0 के सरकारी कार्यालयों में प्रत्येक महीने की पहली तारीख को पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के समय से चल रहीे वंदेमातरम के सामूहिक गायन की परम्परा को नई सरकार द्वारा रोक देने की घटना को पूरे देश में अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के रूप में देखा जा रहा है। आमजन के साथ ही राजनीतिक दलों, खासकर भाजपा […]

इतिहास

सावित्रीबाई फुले: आधुनिक भारत की प्रथम शिक्षिका

भारतवर्ष में 19वीं शताब्दी का उत्तरार्ध शैक्षिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आंदोलनों एवं समाज में व्याप्त अस्पृश्यता, बाल विवाह, सती प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या एवं अशिक्षा के विरुद्ध लड़ाई का स्वर्णिम काल था। आज देश में शिक्षा का स्तर बढ़ा है, सबके लिए विकास के समान अवसर उपलब्ध हैं पर डेढ़ सौ साल पहले यह कल्पना […]

सामाजिक

शिक्षक, बच्चे और अभिव्यक्ति के अवसर

मेरा कोई अपना एक स्कूल नहीं हैं जहां मैं नियमित जाकर काम कर सकूं। क्योंकि मैं बीआरसी में सह-समन्वयक हूं। लेकिन यह मेरे लिए सीखने-सिखाने के एक नये अवसर के रूप में हैं क्योंकि इसी कारण मुझे ब्लाॅक के अन्य स्कूलों में जाने और बच्चों से संवाद करने का अवसर मिलता है जो मुझे एक […]

गीत/नवगीत

गीत – अब मत बांटो रे

टुकड़ों-टुकड़ों में धरती को अब मत बांटो रे। बांट लिया घर, खेत, बाग, मत अम्बर बांटो रे।। गगन चूमते लम्बे तरु बादल पास बुलाते। गरज-गरज खूब बरसते भू की प्यास बुझाते। वृक्ष हमारे जीवन दाता, इन्हें न काटो रे।। ऊंचे उठे पहाड़ देश का स्वाभिमान गाते। जड़ी-बूटियां, फूल, फूल नग-तन महकाते। संस्कृति के संवाहक, रक्षक, […]

गीत/नवगीत

गीत – हंस हुए निष्कासित अब

उजले-उजले लोगों के मन कितने मैले-मैले। रूप सभी का एक मगर अलग-अलग हैं थैले।। स्वार्थ, वाद उर भीतर बैठा, मन में अब प्यार नहीं। प्रीति-रस, गंध से रचा बसा क्या यह संसार नहीं। रक्षक बन तक्षक हैं बैठे, चहुंओर भेड़िये फैले।। है अपना, कौन पराया, सब रिश्ते-नाते झूठे। अर्थ, पद के चहुंओर घूमते, रहते रूठे-रूठे। […]

बाल कविता

धरती तपती

तप्त तवा-सी धरती तपती। अम्बर से है आग बरसती।। गली-गली जल रही शहर की। कली-कली सूखी उपवन की।। साँय-साँय लू-लपट लगाये। तरु-छाया भी सिमट सुखाये।। पशु-पक्षी सब फिरें तड़पते। इधर उधर छाया को तकते। सूखे पोखर-ताल तलैया। दिखती नहीं नदी में नैया।। वट-पीपल की छाँव सुहाती। नीम-छाँव हर मन को भाती।। — प्रमोद दीक्षित ‘मलय‘