कविता

रिश्ते

रिश्ते…. हां अलग-अलग होते हैं रिश्ते कुछ रिश्ते जुड़ते हैं शब्दों से और कुछ दिल से…. जबकि कुछ रिश्ते बस रिसते हैं वजह बेवजह ही दिल के रिश्तों में जरूरत नही होती शब्दो की वो बयां होते हैं नजरों से, अहसासों से कभी देखा है किसी मोमबत्ती को जलते हुए … कितनी शांति और सौम्यता […]

कविता

कविता

कहते हो, डर लगता है तुम्हें मुझसे… कहीं उलझा न दूं तुम्हें शब्दों के जाल में… हां जादूगर भी तो कहते हो मुझे… पर जानते हो…. ये शब्द ही तो हैं जिनमें जिंदा हूं मैं सुनो ….. जब मैं न रहूंगी तब पढ़ना मेरे लिखे को महसूस करना , और कोशिश करना समझने की.. तब […]

कविता

मुमताज

मुमताज़ हां…. मुमताज़ ही तो कहा था तुमने मुझे कितनी खुश हुई मैं सुनकर ताजमहल जैसी कोई याद बनेगी मेरे लिए भी अमर हो जाउंगी जिसके दर ओ दीवार में सदा के लिए मैं….. याद रखेंगी ये दुनियां मुझे कई सदियों तक…. मगर मैं ये कहाँ जानती थी वो ताजमहल बनेगा मेरे ही ख्वाबो की […]

कविता

मौन

सुनो… हमसफ़र बन न सही साथी बन कुछ दूर तक संग चलते हैं… देखते हैं साथ साथ छोटी परछाइयों का बड़ा होना बढ़ते बढ़ते फिर खो जाना…. लाल सूरज का जलते जलते केसरी होना और फिर लालिमा से आरंभ… चाँद का बढ़ते बढ़ते थक जाना और घटते घटते फिर से नई शुरुवात … पर याद […]

कविता

मौन

ये जो तुम देखते हो न एकटक मुझे जानते हो कितनी हलचल मचा जाती है तुम्हारी आंखे न जाने कितनी बेचैनी, कैसी प्यास कितने सवाल और तड़प है इन आँखों मे और कहते हो मैं देखती नही कभी तुम्हारी आँखो में झांककर .. हां ये भी तो कहते हो… कुछ कहती नहीं मैं राज़ रखती […]

कविता

मेरे घर का आईना

मेरे घर का आईना भी कितना झूठ बोलता है आज खड़ी हुई इसके सामने तो दिखाने लगा मुझे मेरे बालों से झांकती हलकी सी चाँदी चेहरे पर उभरती अनुभव की रेखाएं हल्का रंग बदलती आँखे उनके आस-पास बनते काले से घेरे चेहरे की परिपक्वता मगर……. कहाँ परिपक्व हुई मैं अभी अब भी कभी-कभी जागता है […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

प्यास दिल की वो बुझाने आए दो घड़ी पास बिठाने आए खुश थी मैं अपनी ही तन्हाई में अश्क क्यूं साथ निभाने आए जो सियासत करते लाशों की अश्क झूठे वो बहाने आए बंद आंखें जो की दो पल मैंने ख़्वाब क्यूं नींद उड़ाने आए मैं नदी फिर भी मैं प्यासी ही रही दिल ये […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बिछड़ कर तुझसे यूं जीना भी क्या कोई ये जीना है तेरा दर ही मेरा मक्का तेरा दर ही मदीना है गमों का शौक है मुझको तभी तो दिल लगाया है कि आंसूं, आहें, तन्हाई भरा मेरा ये सीना है ज़ुबां पर आ गया मेरी मुहब्बत का जो अफसाना ये आंखें यूं बरसती हैं ज्यूँ […]

कविता

इंतज़ार

सब कहते हैं तुम चले गए … पर मैं नहीं मानती… यह जाना भी कोई जाना है!! अब तक बसी है तुम्हारी खुशबू घर में जिनसे महकते हैं मेरे अल्फाज बिखरे हैं तुम्हारे शब्द जिनको दोहराती हैं दीवारें और वह समा जाते हैं मेरी कविताओं में … तुम्हारे सपनों का तेज़ अब भी चमकता है […]

कविता

महफूज़

पता नहीं कितनी ही सदियों से … वर्ष दर वर्ष बंधती आ रही है राखियां बुजुर्गों ने बताया महत्व राखी बंधवाने वाला करता है हिफाज़त राखी बांधने वाले की हर इक लड़का राखी बंधवाता है और फ़र्ज़ निभाने की कसम खाता भी है फिर क्यों ?? क्यों !!! कोई भी लड़की महफूज़ नहीं कहीं भी […]