आत्मकथा

स्मृति के पंख – 35

इससे पहले का वाकया है जब हम दो पार्टनर रह गये थे मैं व ताराचन्द, तो एक सीजन हमारे पास जम्मू का माल नहीं आया था। कुछ दिन इंतजार के बाद ताराचन्द ने कहा- दिल्ली चले जाओ, चाचा लक्ष्मीदास से बात करना। मैं शाम को दिल्ली को तैयार हुआ और सुबह-2 ही मण्डी जा पहुँचा। […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 34

सुभाष को पतंग उड़ाने का बहुत शौक था। स्कूल से आकर पतंगबाजी में लग जाता। मेरी मजबूरी थी। बच्चों को गाइड नहीं कर पाता। न तो समय था, न ही तालीम। भगवान के भरोसे बच्चों की नाव चल रही थी। बस सोचता ही रहता बच्चे अच्छी तालीम हासिल कर लें, तो यही पूरा सरमाया है। […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 33

हमारे साथियों ने अलग होकर पेशावर फ्रूट कं. नाम रखा। उनकी मुहूरत वाले दिन जब गुरुग्रंथ साहब के पाठ की समाप्ति थी, मैंने भगवान से प्रार्थना की कि मुझे शांति और बल देना। मेरी अरदास स्वीकार होकर, जब हमारा काम फिर से शुरू हो गया, तो उन लोगों को दुख होने लगा। खास तौर पर […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 32

उन दिनों पृथ्वीराज की तबीयत काफी खराब थी और रुपये की भी बहुत मजबूरी थी। एक दिन पृथ्वीराज की तबियत बहुत ज्यादा खराब हो गई। डा0 फौजा सिंह उस दिन नहीं मिले। मैंने रघुनाथ को कहा कि डा0 किशन स्वरूप को चोड़ा बाजार से बुला लाओ। एम0बी0बी0एस0 डा0 की काफी प्रैक्टिस चलती थी। उसका शाम […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 31

पृथ्वीराज पर अनहोनी हो चुकी थी। उसकी सेहत के बारे में हर समय फिक्र रहती थी कि होनहार बच्चा था। छोटी सी उम्र में उसकी जहानत ओर काबलियत का मुझे एहसास होता, परन्तु मुझे लगता था मुझ पर तो अनहोनी हुई है। गुरुबानी का वह श्लोक याद आता है- ‘चिन्ता का की कीजिए जे अनहोनी […]

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स्मृति के पंख – 30

मेरा मन बहुत परेशान था। लेकिन पृथ्वीराज का हौसला बहुत था। उसने कहा- भापाजी क्यों खफा होते हो, मैं शादी नहीं कर सकता तो क्या हुआ, सुभाष के बच्चों को प्यार दूँगा। मैं सोचता- बेटा अभी छोटा है। जब जवानी में तुम्हें इस हालत का अहसास होगा, उस वक्त तेरा हौसला भी टूट जायेगा। समय […]

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स्मृति के पंख – 29

राज व पृथ्वी राज की अपनी अलग दुनिया थी। मेरी मदद को उनका दिल करता कि कब पिताजी का हाथ बटायेंगे, ऐसे ही उनके ख्वाब थे। कभी-कभी मैं उनकी बातें सुनकर हैरान हो जाता। अभी छोटे थे, फिर भी मुझे उनके विचार ओर हौसला पर हैरानी होती। कौशल्या देवी मेरी साली की शादी पर रमेश […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 28

थोड़े दिनों बाद मुझे वही मकान अलाट हो गया। मैंने मण्डी के नजदीक चाहा था, वह मण्डी के नजदीक था, लेकिन मकान खस्ता हालत में था। इसमें एक ही परिवार के 4 लोग दो नीचे और दो छत पर कब्जा किये हुये थे। पहले तो उन लोगों से जबानी बातचीत की कि मकान मेरे नाम […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 27

मलेर कोटले में मुसलमान लोग बैठे थे। और वहाँ बाकायदा पैदावार हो रही थी। वहाँ के मुसलमान पाकिस्तान नहीं गये थे। हमने उन लोगों को जाकर कहा कि लुधियाना माल भेजो। लेकिन वह लोग डरते थे। हमने बाबू बच्चन सिंह एम0एल0ए0 से उनका जिक्र किया। उसने कहा- मुझसे लिखवा कर ले जाओ। उन लोगों को […]

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स्मृति के पंख – 26

केवल सिर्फ 12 घंटे का था, इसलिये उसको माता के साथ अस्पताल के डब्बा में जगह मिल गईं। हमें क्या पता था कि 12 घण्टे का रास्ता 4 दिन बाद खत्म होगा। जहाँ भी रास्ते में हालात की नजाकत को समझते, मिलेट्री वाले गाड़ी रोक देते और मोरचे संभाल लेते। स्टेशन से किसी चीज को […]