आत्मकथा

स्मृति के पंख – 25

बिग्रेडियर ने हमें चेतावनी दे दी थी कि मेरी तबदीली हो चुकी है लेकिन मैं चाहता हूँ कि तुम लोगों को नौशहरा कैम्प बाहिफाजत पहुँचा दूं तब जाऊँ। उनका अपना बच्चा नहीं था। मियां बीवी दोनों बच्चों को बहुत प्यार करते। बच्चों की बेसरो सामानी से उनका मन दुखी होता। कुछ लोगों को हवाई सफर […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 24

हम दोनों गढ़ीकपूरा पहुँचे। जैसा सुना था वैसा ही देखा। गुरुद्वारा के पास ससुर को मिला। मिलेट्री का पहरा लगा था, फिर भी ऐसी सख्ती न थी कि कोई मिलकर बातचीत न कर सके। तजवीज हुआ कि सामान और कौशल्या को मैं साथ ले जाऊँ। उन्होंने कहा मरदान कैम्प में हमारे जाने का ख्याल है। […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 23

यह 1946 या 47 की बात है। वहाँ से भ्राताजी के खत आते। उनसे वह काफी परेशान से लगते जैसे रोजाना उनकी तकलीफ बढ़ रही है। मैंने भाई श्रीराम को भ्राताजी की खबर लेने भेजा। उन्होंने वापस आकर कहा कि वह बहुत दुखी हैं। एक जगह में फौजी कैम्प लगे हैं, वहाँ रहते हैं। सामान […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 22

दूसरे साल भी वह जन्द्र हमने दस हजार रुपये ठेके पर ले लिया। पिछले साल से काफी महंगा था। फिर भी लगता था फायदा होगा। जिस बात का डर था खान के नाम से ही वह खत्म हो गया। जन्द्र की रोटी कभी-कभी सब्जी आलू की बना लेते, नहीं तो नहर पर पुदीना होता था। […]

संस्मरण

स्मृति के पंख – 21

रिसालपुर आकर दूसरी साथ वाली दुकान भी हमने ले ली। बाकी जैसा भ्राताजी ने कहा था, दुकान पर काफी काम था। हमारा पड़ोसी दुकानदार मेरठ की तरफ से आया था और पंडित था। वह भी अकेला काम करता था। काम उसके पास बहुत था। उसके भी काफी ग्राहक हमारे पास आने लगे। भ्राताजी नौशहरा से […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 20

सन् 1941 में बेटी निर्मला का जन्म हुआ। जैसा कि राज और पृथ्वीराज को छोटी उमर में खिलाता रहा था, निर्मला को वैसे नहीं खिला सका। और कुछ समय बाद बहन रामसेना के लड़के रामप्रकाश का जन्म हुआ। उसके बाद बहन की टांगों में तकलीफ रहने लगी। थोड़े समय बाद उनका देहान्त हो गया। रामप्रकाश के […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 19

पिताजी घर में और मुझसे किसी न किसी बात पर उलझ पड़ते। मैं शांति चाहता था। अब भ्राताजी और भाभीभी नहीं थे, फिर पिताजी नाराज क्यूं रहते हैं। मैं ऐसी हालत में हर समय उदास रहता। घर में महाभारत हो तो किसके दिमाग में सकून हो सकता है। मुझे कोई ऐसी बात भी बड़ी बुरी […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 18

अनन्तरात के बड़े भाई किशोरी लाल मरदान में सिनेमा मैनेजर थे। उनसे हमने जिकर किया। एक तो उन्होंने वकील कर दिया जिसका नाम था हरीभजन भाटा और यह भी तसल्ली थी कि वह कोशिश करेगा। हमें लगता था कि मुझे बरी कर दिया जायेगा, लेकिन फैसले वाले दिन नवाब टोरू का एक रुक्का गोकुलचन्द ने […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 17

कुछ समय बाद सुशीला की मासी के लड़के गंगा विशन की शादी थी। उसने मुझसे कुछ मदद मांगी मैं उसे साथ में मरदान ले गया और अपने एक व्यापारी से कुछ सामान खरीदना चाहा। वह समझ गया कि मैं यह सामान इसके लिये (गंगा विशन) के लिये खरीद रहा हूँ। उसने मुझे बाहर बुलाकर कहा, […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 16

वारस खान पार्टी का एक भरोसे मंद लड़का था। उसका बड़ा भाई नम्बरदार था और नवाब टोरू का कारिन्दा था। उससे छोटा भाई नवाज खान सी0आई0डी0 का इंस्पेक्टर था। वारस खान सबसे छोटा था और मुल्क के काम में आगे ही रहा। उसकी दोनों टांगे नहीं थीं, लंगड़ा था, बैसाखी से चलता था और शौकिया […]