आत्मकथा

स्मृति के पंख – 5

बैसाखी का दिन था, मरदान के पास डेरा बाबा कर्मसिंह पर मेला लगता था। भ्राताजी और कुछ साथी मेला देखने गए। मनीराम हमारे पड़ोस में ही रहते थे बिल्कुल सामने उनका मकान था। ईश्वर जाने मनीराम के दिल में भ्राताजी के खिलाफ कौन सी बात थी कि उसने इतना बुरा काम करने की ठान ली। […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 4

एक दिन पड़ोस में गन्दम (गेहूँ की एक किस्म) पिसवाने के लिए चक्की पर देने के लिए गया। हम 10-12 सेर गन्दम ही पिसवाते और ताजा ही आटा ज्यादा पसन्द करते। जब वापिस आ रहा था, एक नम्बरदार की कुतिया थी, जिसने बच्चे दिये थे। उसने मुझे टांग पर बहुत बुरी तरह काट लिया। खून […]

आत्मकथा

स्मृति के पंख – 3

यात्रा बहुत अच्छी रही। अब हम घर वापिस पहुँच गए। कुछ दिन दुकान को बनाने संवारने में लगे। फिर से मदरसा, खेल-कूद, हंसना और हंसाना। भ्राताजी का रिश्ता भी गढ़ी कपूरा में धवन खानदान में हुआ। हमारे माताजी भी गढ़ी कपूरा की थीं। अच्छा लगता कि भाभीजी भी उसी शहर की हैं। थोड़ा खुलासा अपने […]

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स्मृति के पंख – 2

पूजनीय पिताजी का नियम था सुबह तीन बजे उठना, नजदीक ही गाँव में नदी थी, वहाँ स्नान करने जाना, वहाँ ही पूजा पाठ, संध्या, गायत्री मंत्र का जाप करना। फिर तकरीबन 5 बजे गुरुद्वारे जाना, जहाँ हिन्दू, सिख सब मिल-जुलकर त्योहार मनाते। गाँव में हमारे घर तो बहुत थोड़े थे, पर पिताजी उत्साह से सब […]

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स्मृति के पंख – 1

माँ सरस्वती देवी को बारम्बार प्रणाम करता हूँ। माँ ! मुझे बुद्धि और शक्ति दे ताकि मैं अपनी जीवन गाथा लिख पाऊँ। मेरी मन की ऐसी कल्पना है पर अपने आप को असमर्थ पा रहा हूँ। आपकी कृपा हो तो यह कार्य पूर्ण कर पाऊँगा। मेरी शिक्षा बहुत कम है, बस प्राइमरी तक। इतना कम […]