लघुकथा

मेरी माँ

माँ रोज की तरह काम जल्दी जल्दी निपटा रही थी ..आज किसी फंक्शन में भी जाना था , पांच वर्षीय बेटा शुभ बडे ही गौर से माँ को यह सब करते देख रहा था … ” माँ जब मैं बडा हो जाऊंगा न ,तो आपको रानी बनाकर रखूंगा “ माँ हंस पडी और बोली “तेरी […]

कविता

आओ प्रेम को प्रेममय करते है

न इजहार न गिले शिकवे प्रेम में आओ कुछ समय मौन में जीते है … मै सोचूं तुम लिखो एक गीत प्रेम का आओ मिलकर रचते है … तुम देना गीत को अपना मधुर स्वर मैं थिरकूं बेसुध सी प्रेम को आओ संगीतमय करते है … मैं तेरे नाम से तू मेरे नाम से जाना […]

लघुकथा

घूंघट की दहलीज

“अरी ओ फौजन जल्दी आ आरती को देर हो रही है ” “जरूर साड़ी बदल रही होगी ” “साज श्रृंगार बिना तो हमारी फौजन दहलीज के बाहर भी न आती ” गांव की औरतें बाहर खडी फौजन का इन्तजार करती हुई हंसी ठिठोली कर रहीं थी ।। एक बहू जो शहरी परिवेश की कुछ दिनों […]

लघुकथा

वह भूखी होगी

“अरे आज लंच ब्रेक में छुट्टी लेकर घर जा रहे हो” ” हाँ यार ..आज टिफ़िन लाना भूल गया” “तो आ न …आज मेरे साथ खाना खालो ..मैनै तेरी पसंद के रैस्टोरेंट से ही मंगाया है …आ जा ” रमेश खाना प्लेट मे सर्व करते हुए बोला । ” नही यार ….वो क्या है न […]

कविता

अबकी बार फिर आना

मैं कभी उसकी पायल की झनक, कभी चूड़ी की खनक लिखता रहा, कभी बिन्दिया कभी झुमकों में, उसके रूप को श्रृंगारता रहा ।। सोचा था मिलूंगा जब उससे, उसके सौलह श्रृंगार में से, चुरा लूँगा कोई एक निशानी, रख लूँगा सदा के लिये छुपाके।। आई थी जब वह मिलने गहनों की जगह काले धागे ने, […]

कविता

वो दो सखियाँ …

सबसे छुपते छुपाती आपस में बतियाती कभी घर की बुराई कभी खामियों को एक दूसरे को बताती तो कभी परिवार की अच्छाईयों को व्यक्त करती तराजू के पलडों में रिश्तों के अच्छे बुरे अनुभव को  तोलती वो दो सखियाँ … रिश्तों को सम्भालने की जद्दोजहद करती खो न जाये कुछ इस बात से डरती जीवन […]

कविता

ये औरतें भी न…

बडी आलसी होती है वह औरतें जो रसोई का हर पकवान चख चख कर बनाती हैं स्वाद से खिलाकर परिवार को चाव से जब नही बचता कुछ तो कुछ भी खाकर सो जाती हैं। बडी लापरवाह होती हैं वह औरतें जो घर का हर कोना कोना सलीके से सजा धूल मिट्टी की परत से बचाती […]

कविता

कहानी है औरत

संस्कृति सभ्यता सौन्दर्य की कहानी है औरत —- सूर्य की पहली किरण के साथ द्वार पर लक्ष्मी के स्वागत को उरेन डालने से लेकर रात के सुकून की कहानी है औरत ….. मंथरा कैकयी द्रोपदी तो कभी सीता राधा रुक्मणी सी हर किरदार मे ढलती अलग अलग रूपों की कहानी है औरत …. खाली रिक्त […]

लघुकथा

बात बस इतनी सी है ….कि प्रेम है

उसका गुस्सा उसके नशे से अधिक बलशाली हो गया था ,क्योकि उसे पता चल गया था कि उसकी पत्नी को किसी से प्रेम है । नशा करके बिना बजह पत्नी से मार पीट करना तो रोज का था लेकिन आज उसे बजह मिल गई । उसका पुरुषत्व ये कैसै स्वीकार कर सकता है । बिना […]

कविता

जिन्दगी में लौटकर आना

शुष्क होती जमीन पर बारिश बन  बरसना बेजान होती मुस्कराहटों पर इत्र सा महकना कुछ यूं हुआ है तेरा मेरी जिन्दगी में लौटकर आना ।। मुरझाये ख्वाबों की बगिया का खिलना पंछियों के शोर से ज्यों सुबह का होना कुछ यूँ हुआ है तेरा मेरी जिन्दगी मे लौटकर आना।। बिन घुंघरू  पैरों का थिरकना बेवजह […]