कविता

“रौशनी की तलाश जारी है”

कितनी बार डगमगाई कश्ती , कितनी बार संभाला है तूने भंवर में जब भी फंसी नाव मेरी हर बार आकर निकाला है तूने तुझसे मिलने कोई जुगत लगाऊं कैसे तुझको जानू और तुझको पाऊं कैसे तेरे बारे में मेरा कयास जारी है तू अगर है रौशनी की मानिंद तो, रौशनी की तलाश जारी है.

कविता

“तुमको सोचू”

तुमको सोचू तो जैसे प्यासे को पानी कृष्ण की मीरा दीवानी जेठ की दुपहरी में पीपल की छाव हरी भरी लहलहाती फसल खेलता कूदता बचपन का गांव तुमको सोचू तो जैसे राही की मंजिल खूबसूरती बढ़ाने वाला तिल दौड़ती भागती जिंदगी का ठहराव अल्हड़ मदमस्त जवानी जीवन हंसते खेलते जीने का चाव

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

दिल की बातें जुबां पर कभी लाई नहीं जाती चेहरे की रंगत भी मगर उनसे छुपाई नहीं जाती समझने वाले तो समझ ही जाते है राज-ए-दिल हर बात काग़ज़ कलम से समझायी नहीं जाती

कविता

“फलसफा जिन्दगी का “

फलसफा जिन्दगी से यही हमने सीखा नहीं कोई होता फलसफा जिन्दगी का भूख लगे तब खाना नींद लगे तब सोना मन मगन तब हंसना दर्द मिले पर रोना न दिल को जलाना न ही मन को सताना न सोच सोच बेकार अपना भेजा जलाना जहां पर जैसा मिले वहां वैसा ही चुनना मिट्टी की इस […]

गीतिका/ग़ज़ल

“संभलते कैसे”

अदाओं से तेरी संभलते तो संभलते कैसे निगाहों से तेरी बचके निकलते तो निकलते कैसे, चांद गायब था शब भर तुम भी न आए छत पर फलक पर सितारे चमकते तो चमकते कैसे, डालियों को सीखना है तुमसे मोहब्बत की अदा फूलों से लदकर लचकते तो लचकते कैसे, तुम्हारे आने से आ जाती है फूलों […]

गीतिका/ग़ज़ल

“तुम याद आए”

हुई बरसात तो तुम याद आए उमड़े जज्बात तो तुम याद आए, हिचकियां हिचकियों पर आती रही किसने किया याद तो तुम याद आए, रात महफिल थी सब नशे में थे छिड़ी जब बात तो तुम याद आए, तन्हा छोड़ा मुझे सब घर को गए हुई जब रात तो तुम याद आए, फूल ही फूल […]

गीतिका/ग़ज़ल

करीब आ जाओ

गर जानना है मुझको करीब आ जाओ पहचानना है मुझको करीब आ जाओ, दुआ सलाम से फितरत नहीं जानी जाती दिल्लगी है तो फिर हाल ए दिल सुना जाओ, किनारे बैठ कर दरिया की गहराई नहीं मिलती जो सागर से मोहब्बत है तो सागर में समा जाओ, मंदिर मस्जिद से इबादत का भरम होता है […]

गीतिका/ग़ज़ल

“अपने जैसे लगते हो”

कितने वर्षों बाद मिले हो, पर अपने जैसे लगते हो, आंख का पानी सूख गया है, तुम भी कितना गम सहते हो, एक दिन जीवन होगा अपना, बोलो तुम भी क्या कहते हो, एक सपना मैंने देखा है, तुम भी तो सपने बुनते हो, दर्द छुपाने में हो माहिर, मेरी तरह तुम भी हंसते हो, […]

गीतिका/ग़ज़ल

“कुछ पता नहीं”

इंसान तो दिखते हैं इंसानियत का कुछ पता नहीं मासूम तो लगते हैं मासूमियत का कुछ पता नहीं समाज सेवक उग आये हैं गलियों और मोहल्लों में दिल के अंदर क्या है इनके नीयत का कुछ पता नहीं भीड़ का क्या है भीड़ तो सिर्फ जज्बाती होती है किसके बहकाने से बहकेगी जम्हूरियत का कुछ […]