कविता

बादल राग

एक बादल उड़ा और पहुँच गया चाँद के पास, उसने चाँदनी को पाया अपनी रूह से गुज़रते हुए, बहुत देर तक बजती रहीं छोटी-छोटी घंटियाँ जैसे कोई प्रेयसी प्रवेश करती है अपने मंदिर में! उसने देखा चाँद की आँख में छिपे आँसुओं के झरने को, उसने सुना चाँद की आत्मा में जलतरंग पर बजता हुआ […]

कविता

कब्र में जाग रही हैं डेढ़ सौ औरतें

  इस बर्फ-सी जमी रात में कब्र में जाग रही हैं डेढ़ सौ औरतें दरअसल उन्हें आता ही नहीं था सोना जिस दिन आने लगती थी नींद बालों से पकड़ कर खींच लिया जाता था उन्हें और फिर भौथरे चाकू से हलाल किया जाता था रात भर सोने और जागने के बीच कराहने की आवाज़ […]

कविता

कविता : उदासी का अक्स

कल रात आसमान से चाँद गायब था। आज सुबह खिड़की से बाहर देखा तो अशोक का वृक्ष गायब था। इतनी खामोशी थी कि मुझे पता चल ही गया कि सुबह सुबह कूँकने वाली कोयल भी गायब है। रौशनी थी चूँकि सूरज उग रहा था। हवा थी क्योंकि उसे नाराज़ होना नहीं आता था। पास के […]

कविता

।।यूरेका।।

आसमान से हर शहर वैसा ही दिखता है जैसे हर शहरी आदमी आमतौर पर लगता है सभ्य नदियाँ दिखती हैं मिट्टी पर खींची गदली रेखाओं सी और पहाड़ियां छोटी छोटी कुकुरमुत्ते की छतरियों जैसी ऐसे में सबसे ज्यादा चमकते हैं जंगलों के बीच छोटे छोटे तालाब जहाँ आदमी पानी पीता है चौपाया हो कर जिनमें […]

कविता

किनारे की तलाश में

वह आसमान से गिरा था। समुद्र में तैरते हुए उसे याद ही नहीं आया कि मौत हर वक्त उसके आस पास ही होगी।  उसने चाँद को देखा वह भी उसी तरह आसमान में तैर रहा था, उसके पास भी धरती का कोई अता पता नहीं था। पर चाँद के पास सूरज की सराय में पनाह तो […]

कविता

॥ स्त्री और समुद्र॥

वह हर शाम आती है अकेली और उदाससुनने मेरा कोलाहलकहने अपने मन की बात हम घंटों बतियाते हैं, पागलों की तरह वह मानती है मुझे अपना दोस्त! उसकी जेब में होता है एक पुराना रूमाल जिससे चिपकी है उसके प्रेमी के आँसुओं की गंध उसने बताया था वह रोया था एक दिन बिना कुछ कहे शायद […]

कविता

॥ बढ़ई की परेशानी ॥

बढ़ई समझ नहीं पा रहा है उसकी संरचनाएं क्यों नहीं होती किसी कुम्हार की सुराहियों जैसी लुहार के हँसिए जैसी या सुनार के जेवरों सरीखी चिकनी और चमदार उसे चीरना पड़ता है एक पूरा शहतीर आरी चलाते चलाते थकने लगते हैं हाथ फूलने लगती है साँस और फिर भी रह जाता है काष्ठ खण्ड खुरदुरा […]

कविता

॥स्त्री बनने के बाद॥

जैसे दिया जूझता है हवा के झोंके से किसान लड़ता है टिड्डियों के हमले से बच्चा निपटाना चाहता है अपना होमवर्क सूरज तैरता है बादलों की नदी में उम्र के इस पड़ाव पर स्त्री जूझती है अपने ही शरीर से उसे बार बार होता है कमर दर्द नहीं ठहरती आँखों में नींद थका-थका सा रहता […]