गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : आग दरिया मे’भी लगा देना

बहर २१२२ १२१२ २२ काफ़िया- आ रदीफ़- देना ख्वाब आए नहीं जगा देना। प्यास दिल की मिरे बुझा देना। रात आकर मुझे सताती है नींद आती नहीं सुला देना। गैर की बाँह का सहारा ले आप उठना मुझे गिरा देना। देखने हैं मुझे सितम तेरे याद आकर मुझे भुला देना। राज तुम तो कभी न […]

मुक्तक/दोहा

कंगाली

दोस्त ने दोस्त से पूछा कैसा है उसका हाल यह जानते हुए भी कि उसकी ज़िंदगी है बेहाल फटी जेब सी ज़िंदगी जी का है जंजाल रेज़गारी गिनी तो जाना कितना हूँ कंगाल। डॉ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

कविता

कविता : ख़्वाहिशें

कतरा-कतरा पिघल रही हैं आहें तेरी यादों की , जी चाहे साँसों में भर लूँ खुशबू तेरी चाहत की। टकरा कर लहरों सी लौटें आहट तेरी पायल की, जी चाहे उर बीच सजा लूँ धड़कन तेरी चाहत की। अँगारों की सेज पे सोई अर्थी तेरी चाहत की, जी चाहे पलकों पे रख लूँ ख़्वाहिश तेरी […]

कहानी

कहानी : आँचल के शूल

हमेशा की तरह आज भी सौतन बनी घड़ी ने सनम के आगोश में मुझे पाकर मुँह चिढ़ाते हुए दस्तक दी। मैॆं अनमने मन से उठने ही वाली थी कि बाहों के घेरे से छनकर निकला स्नेह अनुरोध सुनाई पड़ा- “अभी हॉस्पिटल चलने में समय है, थोड़ा आराम कर लो… बाद में तुम्हारा वात्सल्य हमें एक […]

मुक्तक/दोहा

“शिव महिमा” दोहे

शिव महिमा”पर दोहे द्वादश लिंग बिराजते, पावन तीरथ धाम। आग नयन विष कंठधर, त्रिपुरारी प्रभु नाम।। फागुन चौदस रात को,बिल्वपत्र जल हाथ। पूजा -अर्चन जो किया, पार लगायो नाथ।। हाथ जोड़ विनती करे, कृपा दृष्टि प्रभु ज्ञान। देख भक्त अनुराग को,खूब बढ़ायो मान।। आए हैं बारात ले, भस्मी तन पर साज। भूत प्रेत सँग राजते,स्वागत […]

पद्य साहित्य

“त्रिपुरारी दूल्हा बने” (कुंडलिया छंद)

“त्रिपुरारी दूल्हा बने” (कुंडलिया छंद) त्रिपुरारी दूल्हा बने,स्वागत नगरी आज। आए हैं बारात ले, भस्मी तन पर साज।। भस्मी तन पर साज, चले भोले मस्ताने। नंदी देख सवार,भक्त लागे अकुलाने।। कह “रजनी”ये बात,आज काशी भइ न्यारी। खूब बढ़ायो मान, बसे नगरी त्रिपुरारी।। डॉ. रजनी अग्रवाल”वाग्देवी रत्ना”

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

महाशिवरात्रि और शिवजी की बारात

आज मैं आपको भोले की नगरी काशी की शिव बारात से रू-ब-रू कराती हूँ ,जिसमें शिवजी भस्मी रमाये दूल्हा बनकर निकलते हैं और पूरी काशी हर्षोल्लास से बारात की अगवानी करती है। हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का विशेष धार्मिक महत्त्व है। यह पावन पर्व बड़ी ही श्रद्धा और उल्लास के साथ फाल्गुन के महीने में […]

पद्य साहित्य

“मत्तगयंद छंद”वियोग रस प्रधान रचना

(9)प्रीत लगी जब साजन से तब नैंनन नींद सखी नहि भाए । चातक के सम राह तकूँ नित आवत रात मुझे तड़पाए । जाग कटे रतिया सगरी बिन साजन चैन जिया नहि पाए। आन मिलो सजना हमसे रजनी अब सेज सजा अकुलाए। डाॅ. रजनी अग्रवाल “वाग्देवी रत्ना”

सामाजिक

लेख : आज की नारी

सहधर्मिणी, संस्कारिणी, नारायणी की प्रतीक नारी की महत्ता को शास्त्रों से लेकर साहित्य तक सर्वदा स्वीकारा गया है।”यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते , रमन्ते तत्र देवता।” नारी को प्रारंभ से ही कोमलता, सहृदयता,त्याग-समर्पण, क्षमाशीलता,सहनशीलता की प्रतिमूर्ति माना जाता रहा है।ऋग्वेद में जहाँ विश्वरा, अपाला, लोमशा, जैसी विदुषियों ने सूक्तों की रचना की वहीं मैत्रेयी,गार्गी,अदिति जैसी विदुषियों ने […]

कविता

“प्रियतम मेरे”

प्रियतम मेरे प्राची उदित भानु से प्रमुदित, जीवन में तुम आए थे। स्वर्ण कलश की आभा लेकर, प्रीत बसा मन भाए थे।। माँग भरी अरुणाई मेरी, सपन सलौने लाई थी। अधर सजाए गीत प्यार के, मन ही मन मुस्काई थी।। कंचन काया रूप सजा कर , तेरे घर मैं आई थी। अपनों सा अपनापन पाकर, […]