कविता

“चुनावी दौर”

*चुनावी दौर* चली जब भूख की आँधी चुनावी टोलियाँ देखो। बिकाऊ लोग चलते हैं निकलती गोलियाँ देखो।। पहन टोपी शराफ़त की उछालें नाम ये देखो। सड़क पर होड़ सत्ता की, लगाते बोलियाँ देखो।। चुनावी दौर में यारों ठनी है बाप बेटे में। कहें इक -दूसरे को चोर नेताजी लपेटे में।। चले राहुल लिए अखिलेश मोदी […]

कविता

रिश्ते

प्रीत बरसती थी रिश्तों मेंअंगारे क्यों भभक रहे हैं ?बोए हमने फूल यहाँ थेकाँटे फिर क्यों उपज रहे हैं? संस्कार अब विलुप्त हो गएमाँ -बहनें यहाँ लजाती हैं,सरे आम लज्जा लुटने परअपराधिन सी बन जाती हैं। कलयुग की काली आँधी नेमान-सम्मान सब उड़ा दिया,जिन मात-पिता ने जन्मा थानिज जीवन से ही हटा दिया। वृद्धाश्रम में […]

कविता

आँचल

याद आती है माँ मुझे, तेरे आँचल की छाँव ममता से सँवार के, सिर को सहलाया। शहद से मीठी थी वो, मिर्ची सी तीखी डाँट भी प्यार अपना लुटाके, कनिया पे बिठाया। स्नेह निर्झर बहता माँ तेरी मृदु लोरी से सपनों को सहला के, थपकी दे सुलाया। शीतल वायु के झोंखे, तेरी प्यारी गोद बने […]

कविता

कश्ती

आँखों में मेरी सावन पा, मनमीत लुभा कर रूँठ गया। जीवन में प्यासी कश्ती को, हर रोज़ रिझा कर लूट गया। माँझी जिसको समझा मैंने, निकला काग़ज़ की कश्ती वो। पाकर लहरों के आलिंगन, खुद भूला अपनी हस्ती वो। अरमानों की सेज सजाये, मैं राह सनम की तकती हूँ। पा जाए कश्ती साहिल को, हर […]

कविता

आया मधुमास

पीत वसन धारा मधुमासा। पुलकित उर जागी बहु आसा ।। सुरभित सरसों हिय मदमाती। देख तिन्हें अवनि हरषाती।। वन-उपवन में छाई बहार। शारदे! आ जाओ इक बार।। स्वर्ण कलश ऊषा छिटकाई। पीत चुनर खेतन लहराई।। हिम कणिका से माँग सजाई। कर सिंगार धरा मुस्काई।। पूजती रजनी बारंबार। शारदे! आ जाओ इक बार।। — डॉ. रजनी […]

हाइकु/सेदोका

हाइकु “मौत का सौदागर”

गिद्ध नज़र मौत का सौदागर लहू लुहान मेरी ज़ुबानी दहशती बोलियाँ लहू कहानी आतंकवाद दरिंदगी का नाम खूनी शैतान अश्क सैलाब हैवान है तेज़ाब रोए इंसान बंदूकी गोली सीमा पर सैनिक खून की होली करें संहार बंदूकें हथियार उजड़ी बस्ती बेबस चींखें खूनामही हो गिरा सिंदूर धुला ध्येय हमारा एकजुट हो जाओ देश बचाओ — […]

कविता

कविता : काश, कोई रखवाला होता !

अरमानों के पंख लगाके, इस दुनिया में आई थी। रूप रंग सिंगार देखके, सबके मन को भाई थी। बड़े प्यार से बाँह थाम के, चरखी का सँग पाया था। मतवाले दो हाथों ने भी, ढेरों नेह लुटाया था। बँधी डोर से खुले गगन में, ऊँचाई को छू जाती। रंग-बिरंगी सखियों को पा, झूम भाग्य पर […]