कुण्डली/छंद

कैसे -कैसे-कुंडलियां छंद

1-कैसे -कैसे मित्र ये ,मुख पर मीठी बात । अवसर को लेते भुना ,फिर देते आघात ॥ फिर देते आघात,सदा ये काम बिगारैं । होठों पर मुस्कान, सदा ये राम उचारैं ॥ डस -डस लेते यार,सर्प लिपटे हों जैसे । मुश्किल पाना पार , मित्र ये कैसे -कैसे ॥ ********************** 2-कैसे कैसे लोग हैं ,कैसा […]

कहानी

अर्थी सुसंस्कारों की

यूँ तो कहा जाता है “ सत्य,धैर्य, क्षमा,दया,सहिष्णुता और सेवा भाव मनुष्य के जीवन को गौरव प्रदान करते हैं लेकिन जब इन्हीं गुणों के कारण अपमान,तिरस्कार और जिल्लत भरी ज़िंदगी जीनी पड़े तब भँवर में फँसे उस व्यक्ति को समझ नहीं आता कि वह उसमें फँस कर मर जाए या उससे बाहर निकलने के लिए […]

कविता

उम्मीद का दिया जल रहा है -छंद मुक्त कविता

बुझता दिया सुकूं का इंसान ही के कारण , बुझता दिया यकीं का इंसान ही के कारण । बुझता दिया मुहब्बत का इंसान ही के कारण , आते हैं दुःख जीवन में इंसान ही के कारण ।। पर उम्मीद का दिया तो दिनरात जल रहा है बुझता नहीं कभी वो, आँधियों से लड़ रहा है […]

लघुकथा

घिनौनी सोच -लघुकथा

सत्यभामा `महिला क्लब’ चलाती थी और समाज की कमजोर स्त्रियों को आगे बढ़ाने का ढोंग करती थी । भ्रूण हत्या और घरेलू हिंसा पर बड़े -बड़े भाषण देती थी । अमीर लेकिन बुद्धिहीन स्त्रियों में उसकी अच्छी खासी पकड़ थी । हर स्त्री उनके चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेती थीं और जब – जब […]

मुक्तक/दोहा

दो मुक्तक

सभी आत्मीय मित्रो ,को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ … 1 -मेरा देश है प्यारा मुझको ,यह मेरी पहचान है इससे ही है वजूद मेरा,आन,बान और शान है सीमा में प्रहरी बन तत्पर रक्षा में तैनात खड़े जो बारम्बार नमन करते , उनसे ही देश महान है । 2 -आज़ादी का मर्म न समझा ,बदल […]

गीत/नवगीत

न जाने कैसीआज़ादी ? -गीत

न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है? सारे जहां में हो रही रुसवाई है । `सारे जहां से अच्छा’ गाते रहे हैं हम अतीत के गौरव को मिटटी में मिलाई है । न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है ॥ दल -बदल रहे हैं कुर्सी के वास्ते सब निज स्वार्थ के लिए सब लड़ रहे […]

लघुकथा

लघुकथा – धंधा

डॉ विद्योत्तमा को घनिष्ठ परिचित और प्रतिष्ठित लेखिका मधुरिमा का फोन आया । विद्योत्तमा तुमसे एक बात कहनी है-“ समझ नहीं आ रहा कि कहूँ या न कहूँ” । विद्योत्तमा ने कहा -`ऐसी क्या बात है जो आपको कहने में इतना संकोच हो रहा है ”। मधुरिमा ने कहा – तुम बहुत सिद्धांतवादी हो न […]

कुण्डली/छंद

घन -घन गरजत-घनाक्षरी

घन -घन गरजत, कारे मेघ बरसत, जियरा में बहुतहि ,अगन लगावै है दम -दम दमकत, चंचल बिजुरिया जो, तडपत मनुआं को, बहुत डरावै है घटा घनघोर चढ़ी, बहुतहि शोर करी, प्रियतम तोरि सुधि, बार-बार आवै है कारी-कारी रतियों में, बरसत अँखियाँ से , मदनहुँ मोरि तन, बहुत जरावै है। डॉ रमा द्विवेदी

हाइकु/सेदोका

वर्षा ऋतु पर हाइकु

१- बरखा आई झूमती इठलाती नाच नचाती | २- मनुआं भीगा बूंदों की टिप-टिप गीत सुनाती | ३- पाजेब नहीं बूदों की रुनझुन गुनगुनाती | ४- बरसो मेघ ऋतु है बहार की पेंगें प्यार की | ५- भीगी -भीगी -सी सावन की हैं रातें ख्वाबों में बातें | डा. रमा द्विवेदी

लघुकथा

पापियों को ही बेटियाँ ? -लघुकथा

गभीर रूप से बीमार माँ ने अपने शादीशुदा अफसर बेटे अखिलेश से कहा -“ बेटा मेरे मरने के बाद अपनी दोनों छोटी बहनों का ख्याल रखना ,कभी कभी बुला लिया करना उन्हें ”। बेटे अखिलेश ने जवाब दिया -“ मैं दस -दस साल नहीं बुलाऊँगा ”। माँ ने कहा -“ वे अपने घर में इतना […]