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  • कविता की उत्पत्ति

    कविता की उत्पत्ति

    दर्द की ज्वाला जब फूटती है तो कविता खुदबखुद निकलती है प्यार की डोर जब टूटती है तो कलम खुदबखुद चलती है मन जब अंदर से रोता है तो शब्दों का सैलाब आता है और अपना...

  • अकेला हो गया हूँ…

    अकेला हो गया हूँ…

    मैं ग़मों की भीड़ में खो गया हूँ मैं अब एक गुमशुदा हो गया हूँ ढूंढते रहें जमाने वाले मुझे मैं तो दर्द का प्याला हो गया हूँ अब आता रहे कोई भी मौसम  मैं पतझड़...

  • उड़ान

    उड़ान

    उड़ान भर लो अपने मन में चल देना तुम सीना तान लाख कोशिश कर ले दुनियाँ पाओगे मंजिल और पहचान डरना नहीं तूफानों से तुम जगाना दिल में यह अरमान अपने कर्मों के ही बल से...

  • सुख का बोध….

    सुख का बोध….

    सुख का बोध होगा कब अब मेरे पास है सब पर उलझ हूँ उलझन में इस ह्रदय की तड़पन में कब आएगा सुख का मेला जहाँ हो जीवन का ठेला कैसे मैं जज़्बात कहूं इस गम...

  • सिर्फ एक धड़कन

    सिर्फ एक धड़कन

    कोई नहीं है इस दुनियाँ में सिर्फ अकेलेपन के चूर हो गए वो सपने मेरे बुने जो जीवनभर के न जाने क्या है जीवन में गुजर रहा डर डर के पीड़ा ही मिलती है हरदम जख्म...


  • ग़म की मंजिल…

    ग़म की मंजिल…

    मैं न जाने कहाँ खो गया हूँ मैं खुद में खुद को खोज रहा हूँ पर मिलना है बहुत ही मुश्किल क्योंकि में अजनवी हो गया हूँ नहीं पता मुझे खुशी और ग़म मैं तो अब...

  • ठोकर

    ठोकर

    हमको अब सारी दुनिया को बताना है सभी चेहरों को मैंने पहचाना है यहाँ सभी ने नक़ाब पर नक़ाब पहने है ठोकर खाकर मैंने सबकुछ जाना है लोग बाहर से मीठे अंदर से विषैले हैं अपने...

  • सफ़र

    सफ़र

    इस जमाने में बहुत लोग मिलेंगे                     कुछ सहारा देंगे कुछ मायूश करेंगे लेकिन हमें सोचना है हम क्या करें इस जालिम जमाने से कैसे लड़ें यदि इनसे...

  • सफ़र

    सफ़र

    सब्र कर वन्दे तेरे भी दिन आएंगे कर रहे हैं आज जो तेरी बुराई कल वही लोग तुमको मनाएंगे बस ईमानदारी से मेहनत करो आप जरूर ही आगे बढ़ जाएंगे सफर में कठिनाइयां तो बहुत होंगी...