कविता पद्य साहित्य

अधूरापन

जिन्दगी का हर पहलू लगता मुझे अधूरा मिलकर एकपल खुशी कभी होता नहीं पूरा क्या गम क्या हंसी है हंसी कितनी सजी हैं दुल्हन बनकर आती है जनाज़ा तरह जाती है कौन काटें ये दर्द कैसे मीटे ये दर्द आंसू बनकर निकले तड़प बनकर मचले इच्छाएं सीमाहीन ख्वाब आशाहीन चाहत की प्रबलता सीमा पार न […]

कविता पद्य साहित्य

हे मानव !

हे मानव !! क्यों झूठ का गठरी लिए सर्वत्र घूम रहा है क्यों मानव होकर दे रहा मानव को ठोकर गलत भावनाओं से ग्रसित द्वेष्यता की आग में मानवता को जला डाला क्यों बनाता मानवीय आकार दिखाता एकाकार छल-कपट कुरीति द्वेष-दम्भ अवसरवादिता दुर्भावनापूर्ण अवसादों के सानिध्य में कब-तक पलोगे कब-तक चलोगे हे मानव !! अब […]

कविता पद्य साहित्य

नव वर्ष हमारा आया है..

नव वर्ष हमारा आया है, खुशियों भरा फूल लाया है, सभी जगह सुगंध फैलाया है प्रकृति नव वर्ष दिखाया है। सर्दी-गर्मी के संगम में सुहानी बयार के उमंग में फूल खिले हैं सभी मन में फुर्ती दिख रहे सभी तन में। खेतों में फैली हरियाली छटा बिखेर रही निराली बागानों में नव फूल खिले हैं […]

पद्य साहित्य भजन/भावगीत

सरस्वती वंदना

वीणावादिनी ज्ञान दायिनी ज्ञानवान कर दे…. माँ रूपसौभग्यदायिनी नव रुप भर दे…. जीवन में नव रस नव गीत नव स्वर भर दे… हंसवाहिनी श्वेतांबरी जग उज्ज्वल कर दे….. वीणापाणिनि शब्ददायिनी शब्दों से भर दे…. ज्योतिर्मय जीवन तरंगमय जीवन सभी जन प्रकाशयुक्त सभी जन ज्ञानयुक्त अंधेरी निशा को जीवों से दूर कर दे….. सत्य पथ सत्यमय […]

कुण्डली/छंद पद्य साहित्य

लगता मुझे है अब,बहकने वाले हैं (मनहरण घनाक्षरी छन्द)

चाँदनी चमक लिए,चाहने की चाह लिए दिल में चाहत भरा,क्यों लिये चल रहीं। बाल तेरे काले काले,चाल तेरे हैं निराले नयनों में दिखे मुझे,ख्वाबो में पल रहीं। ओठ हैं गुलाबी रंग,बाल छूए गोर गाल भरा मन चंचलता,भावना नम रहीं। चेहरे के सभी अंग,आभा हैं संयोग ओज छोड़ती प्रकाश पुंज,ऐसा क्यों कर रहीं॥1॥ बाल फहराये जैसे, […]

पद्य साहित्य

चाहत

चाँदनी चमक लिए,चाहने की चाह लिए दिल में चाहत भरा,क्यों लिये चल रहीं। बाल तेरे काले काले,चाल तेरे हैं निराले नयनों में दिखे मुझे,ख्वाबो में पल रहीं। ओठ हैं गुलाबी रंग,बाल छूए गोर गाल भरा मन चंचलता,भावना नम रहीं। चेहरे के सभी अंग,आभा हैं संयोग ओज छोड़ती प्रकाश पुंज,ऐसा क्यों कर रहीं॥1॥ बाल फहराये जैसे, […]

अन्य

नाटक – समझौता (सत्य घटना पर आधारित)

पात्र परिचय -: राकेश -सहायक शिक्षक राज- सहायक शिक्षक कविन्द्र- सहायक शिक्षक दिपक-प्रधान शिक्षक हिरा- विशेष पदाधिकारी (चयनित) विवेक -बरिष्ठ पदाधिकारी(चयनित) ••••••••••• विवेक ~ हाँ तो बताइए आप सबका मामला क्या है। दीपक~ सभी शिक्षक मिलकर मुझे परेशान करतें हैं छोटी छोटी बातों को लेकर हंगामा करने पर उतारू हो जाते हैं। विवेक~ यह एक […]

ब्लॉग/परिचर्चा लेख

साहित्यकार का समाज के प्रति दायित्व

समाज से साहित्य,साहित्य से साहित्यकार,साहित्यकार से समाज एक दूसरे से ऐसे जुड़े हुए हैं जैसे कौई तीन पहिये वाली गाड़ी हो जो एक दूसरे के बिना एक पग भी नहीं चल सकते। जिस प्रकार से साहित्य समाज का दर्पण होता है उसी प्रकार से साहित्यकार लोकतंत्र का स्वतंत्रता की दृष्टि से एक अहम हिस्सा है। […]

कविता पद्य साहित्य

दिवाली कैसे मनाऊँ

दिवाली कैसे मनाऊँ दीया तो बना लिया ईश्वर के निशुल्क दिये मिट्टी और पानी से इसमें तेल कहाँ से लाऊँ तेल बीन सर के बाल चिपक गये तन में चिकनाई नहीं बाती कहाँ से लाऊँ कपड़े जो फटे है उससे तन को ढकते हैं चिंगारी कहाँ से लाऊँ न खेत है न खलिहान है पिता […]