कविता

/ विचार /

विचार होते हैं मनुष्य के विभिन्न प्रकार के विचार ही मनुष्य के विविध रूप हैं विचार नहीं तो मनुष्य नहीं है धर्म हो या दर्शन अपने विचार के अनुरूप लगते हैं सही या गलत विचार के अनुरूप लगता है अपना या पराया ऊँच – नीच, सही – गलत विचारों की दुनिया में विचारों के साथ […]

कविता

/ भारत रत्न बाबा साहब अंबेडकर /

जन्म हुआ था, महार जाति में विकास हुआ था, विश्वनर के रूप में वर्ण के साथ, वर्ग के साथ, जाति के साथ मत जोड़ो पूजा मत करो, देवता नहीं मानव हैं वे मानवता के बोध हैं भेद – विभेदों का जाल तोड़ो समता – बंधुता, भाईचारा भर लो अंधकार को चीरते हुए निकल आया है […]

कविता

संस्मरण

यात्री हूँ मैं जीते -जागते निकल जाता हूँ द्वन्द्व के दुर्गम मार्ग को, युद्ध होता है विचारों के विशाल अवनि पर जीत है, हार है स्वीकार है, तिरस्कार है निंदा – स्तुति है, मान – अपमान है मानव के इस जग में, अंतरंग के संगम क्षेत्र में समेटकर चलता हूँ ज्ञान – विज्ञान की रोशनी […]

कविता

तोड़ो ..चुप्पी को

सच कहना एक साहस है जाति के इस समाज में सच सुनना भी अपराध है अंध श्रद्धा के आवरण में हर जगह जातीय श्रेष्ठता का पहारा है, स्वतंत्रता, समानता एक परिहास है असहाय जनता के साथ, इस झुंड में। अपमान, तिरस्कार, घृणा ये आम बात समझते हैं, वो मनु परंपरा की गोद में पला, मशगूल […]

कविता

/ पशु नहीं हूँ मैं…/

ईंट की तैयारी में मैंने पसीना बहाया है, दीवार बनाने में मैंने अपनी मांस पेशियां पिघला दी हैं, छप्पर, प्लास्टरिंग, रंगाई सब कामों में मैंने अपनी शक्ति दी है आज तुमने इस भवन में भगवान को बिठाया है मेरा श्रम मंदिर बन गया लेकिन मैं बाहर का हो गया मंदिर में मेरा प्रवेश निषेध है […]

कविता

/ झूठ /

हर जगह कई लोग चुपके – चुपके चलते हैं अपना मुँह छिपाते वो धीरे – धीरे चलते हैं वर्ण-जाति-वर्ग की निशा में एक दूसरे को कुचलाते भेद – विभेद, अहं की आड़ में असमर्थ बन बैठे हैं मनुष्य एक दूसरे को जानने में, समता-ममता-बंधुता-भाईचारा अक्षरों की दुनिया में एक सुंदर सपना है सुख-भोग की चिंता […]

भाषा-साहित्य लेख

वैश्वीकरण के दौर में हिंदी

आज हम वैश्वीकरण की दुनिया में हैं। वैश्वीकरण शब्द अँग्रेजी के ग्लोबलैजेशन शब्द का पर्याय शब्द है। यह दो शब्दों से बना है विश्व + एकीकरण इसका अर्थ है एक छत के नीचे आकर एक दूसरे की मदद करना। देश की अर्थ व्यवस्था को विश्व की अर्थ व्यवस्था के साथ जोड़ना ही वैश्वीकरण या भूमंडलीकरण […]

कविता

/ विवेचना /

नहीं हूँ मैं किसी जाति या धर्म दंभी, मानता हूँ गुरू को सिर झुकाकर वंदना दिल से करता हूँ धन – दौलत व संपत्ति का नहीं हूँ मैं दंभी, अहं का अट्टहास नहीं गुरू को श्रेष्ठ मानकर चरणों को छूता हूँ नहीं हूँ मैं कभी भी विद्या दंभी पोथी पढ़ी – पढ़ी जग का पंडित […]

कविता

/ सूरज अस्त नहीं होगा /

होते हैं रास्ते विचारों में अनेक टेढ़े – मेढ़े, सीधे – साधे मिट्ठी, कंकड़ – पत्थर के हैं कहीं – कहीं काँटे भी होते। चुनना होगा हमें ही बुद्धि से उचित पथ कौनसा है हमारा निकालना पड़ता है रास्ते से पीड़ा – बाधा के उन काँटों को चुभनेवाली उस मूढ़ता को हटाना पड़ता है पत्थर […]

कथा साहित्य कहानी

/ मेरी भोली माँ /

पलंग पर बैठा मैं पुस्तक पढ़ रहा था। परीक्षाओं की तैयारी में कर रहा था। घंटी बजाते हुए एक ठग पास आकर मेरा भविष्य बताने लगा – ” तुम मुसीबतों में फँसनेवाले हो । तुम नीचे गिरोगे, माता अभी तक झूठ नहीं बोली है। ” पहले से ही इन जोतिषियों की घंटी की आवाज़ सुनना […]