कविता

उड़ने दो मन को

उड़ने दो मन को, अनंत आवरण में समन्वित रूप में अपना कुछ बनने दो, विचारों के जग में एकता हमारी हो, अखंड भरत-भूमि में अपना कुछ करने दो, उड़ने दो मन को उड़ने दो मन को । विश्व – गुरू थे हम इतिहास यही बताता है, ज्ञान – विज्ञान में हम अव्वल दर्जे के थे […]

कविता

जिंदगी

अलग नहीं हो तुम कभी मुझे से न मैं हूँ कभी अलग तुम से पारस्परिक सहयोग से चलती है जिंदगी अंतिम सांस तक अकेला कोई जी नहीं सकता सह अस्तित्व है प्रबल शक्ति। भेद – विभेद की रचना में अपने को अलग मानना, अव्वल दर्जे का अहं दिखाना अपने आप में एक छल है भोग […]

कविता पद्य साहित्य

आभार

आभार प्रकट करते हैं हम उस महामानव को जिसने हमारे प्रज्ञा चक्षु खोले कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन का वह पुत्र सर्वसंग परित्यागी गौतम नामधारी महाकारूणिक था, जिसने जीने का सही ढ़ंग मानव समाज को सिखाया । हम चलेंगे उस रास्ते पर मनुष्य केंद्रित है वह मार्ग मानवता का राज्य है समता – ममता, भाईचारे का […]

कविता

प्रकृति की तालीम

अकेला कोई नहीं जी सकता इस दुनिया में एक दूसरे के सहयोग से ही बनती है जिंदगी समूहिक चेतना का सम्मिलित सूक्ष्म तत्त्व है जिंदगी अपना – पराये की भावना, एक दूसरे का मोरचा असमानता का यह भेद अमानवीयता का व्यवहार क्यों घुस गयी है मनुष्य के अंदर कैसे बना है यह मानव जीव वर्ण, […]

कविता

माँ नहीं है.. !

अस्पताल में पलंग पर लेटा था मैं मेरी हालत को देख लहू सूख गया था मां का रोने में भी असमर्थ बैठी थी आँसू भी सूख गये थे उसके शून्यता में डूबी एकटक देखती रह गयी थी नहीं निकल पाया था एक शब्द भी माँ के मुँह से कितनी आशाएँ थीं उसके अंदर मुझे लेकर […]

कविता

यात्रा के पन्ने

परम पिता ईश्वर सत्य मानकर उसके विश्वासों की दुनिया में आशाओं की गली – गली में आस्तिक था मैं ‘ ओं ‘ ‘ ओं ‘ अपने आपमें चलता हुआ एक लम्बी यात्रा मेरी थी । मंदिर – मंदिर के स्वादिष्ट प्रसाद से मेरा भी अनेक भगवान बने थे जहाँ भी जायें, क्या मिला ! मन […]

कविता पद्य साहित्य

// पाठ //

// पाठ // हर जगह यह क्या एक दूसरे पर चढ़ते हैं, पैरवी के जमाने में काले मुख हैं कितने अपना अखड़ दिखाते । बलवानों की दुनिया में वर्ण – वर्ग, जाति -धर्म की है बड़ी – बड़ी बातें आकाश का पताका दिखते, अपनी रीढ़ को मजबूत बनाते । अजब – गज़ब के जग में […]

कविता पद्य साहित्य

// स्वतंत्रता //

// स्वतंत्रता // खिलने दो अपने आप इन नन्हें सुमनों को हाथ न जोड़ो ये मुरझा जाएँगे ये प्रकृति की भव्य संपदा, हर फूल में है अपार सुगंध खुलकर बाहर आने दो सारे जग में फैलाने दो सींचना, खाद देना, हर पल अपने आँखों में देखना है इन मुन्नों को खिलने दो अपने आप इन […]

कविता पद्य साहित्य

// इंतजार में .. //

// इंतजार में.. // संसार के ये घने बादल घुमड़ – घुमड़कर घेरे मुझे, गर्जन करते हैं बरसात की अविचल धारा बन बिगोते चले जाते हैं मैदान भूमि में,डटे रहते जिंदगी का खेल खेलते अविश्रांत खिलाड़ी हूँ मैं, विजय का परिहास और कितने दिन रहते हैं काल की कठोरता में मेरा भी हाथ क्यों न […]

कविता पद्य साहित्य

// यादें .. //

// यादें…// कैसे सोता हूँ मैं आँखभरी नींद में आराम से.. सुखभरे इस पलंग पर! वो यादें हैं अतीत की अभी भी डबडबाई इन आँखों में चलचित्र है ईस्टमन रंग का। निर्जीव-जीव थे हम उस झोंपड़ी में, बरसात में भीगते – धूप में जलते , भविष्य की चिंता में आशा – निराशा की खिंचताई में […]