कविता

मेरे पिता

आप मेरा एहसास आप ही मेरी आस हो मेरे सपनों का आप ही आकाश हो मेरा संबल मेरा आधार हो मेरे हर सुख की पहली पहचान हो मेरी थकन में, मेरी आस हो, मेरे हर सपने का आप ही विश्वास हो मेरी छोटी बगिया के आप ही बागबान हो, शब्दों से क्या बयां करूँ मैं […]

कविता पद्य साहित्य

मैं तिरंगा हूँ…!

मैं तिरंगा हूँ…!! कल रास्ते में मुझे कोई मिला, वह कल 16 अगस्त – 27 जनवरी कुछ भी हो सकता है। नहाया हुआ था वह धूल में, लतपत मिट्टी से सना हुआ, मैंने पूछा महाशय आप कौन हैं और क्यों इस तरह यहाँ पड़े हैं। ‘पड़े हैं’ यह शब्द तथाकथित बुद्धिजीवियों को खटकेगा, जब उस शख्स का नाम पता […]

कविता पद्य साहित्य

बचपन

बचपन आज गली के मोड़ पर ठहरी गाड़ी में कुछ बच्चों को देखा, या यूँ कहूँ मैंने एक ठिठुरा – कैद बचपन देखा।। हाथों में न कंचे थे न थे गुल्ली डंडे वे मुझको जान पड़े कैद सुनहरे सपने।। उनमें से एक बाहर झाँक रहा था जैसे अपना खोया बचपन तलाश रहा था। एक के […]

कविता

आसूँ

ये जो आसूं हैं न, बड़े अजीब होते हैं, जब होता है दर्द तब भी रोते हैं। जब होती है ख़ुशी बहुत, ये तब भी बहते हैं, ये जो आसूं हैं न बड़े अजीब होते हैं। ये तब भी बरसते हैं जब खेतों में बादल धोखा दे जाते हैं, और बरसात की बूँदों की आड़ […]

कविता पद्य साहित्य

आह्वान अर्जुन का

नाद पंचजन्य की रणभेरी आज फिर आई है, कुरुक्षेत्र के रण से युद्ध पताका लहराई है.. सम्मुख फिर वही आज खड़े दोनों भाई हैं, उठा, उठा अर्जुन गांडीव अपना,करने आलिंगन रणदेवी आई है..   मत सोच कि सम्मुख तेरे सगे संबधी या भाई हैं, ये कुरुक्षेत्र है यहाँ न तेरा कोई अपना न भाई है.. मना […]

कविता पद्य साहित्य

बचपन

बचपन   आज गली के मोड़ पर ठहरी गाड़ी में कुछ बच्चों को देखा, या यूँ कहूँ मैंने एक ठिठुरा – कैद बचपन देखा।। हाथों में न कंचे थे न थे गुल्ली डंडे वे मुझको जान पड़े कैद सुनहरे सपने।।   उनमें से एक बाहर झाँक रहा था जैसे अपना खोया बचपन तलाश रहा था। […]

लेख सामाजिक

बॉलीवुड : एक अभिशाप

बॉलीवुड : एक अभिशाप   फ़िल्में मेरी पहली पसंद हुआ करती थी. यक़ीनन आपकी भी रही होंगी. एक समय था जब मैं भी शौकिया फिल्मिया हुआ करता था. शाहरुख़ की तरह स्वेटर कांधे पर रखना, सनी की तरह हैंडपंप उखाड़ने की कोशिश करना, अकेले कमरे में तकिये को दुश्मन समझकर उसे खूब कूटना बहुत भाता था. पर जैसे […]

लेख सामाजिक

कमजोर वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ने की जरुरत

कमजोर वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ने की जरुरत यदि हम प्रेमचंद की कहानी उठाकर देखें तो हमें यह ज्ञात होता है कि आज भारतीय समाज में वही सामाजिक स्थिति बनी हुई है जो मुंशीजी के समय थी. यह कितना बड़ा सोच का विषय है कि हमने पिछले ७०  वर्षों में कई सामाजिक परिवर्तन किए, कई […]

लेख सामाजिक

ये किस दौर में हम जीने लगे हैं…

ये किस दौर में हम जीने लगे हैं… आइये खुलकर जीयें और इस जीवन को मिसाल बना दें…!! जब हम छोटे थे तो सपने देखा करते थे। बड़े होंगे , बड़े होकर ये करेंगे – वो करेंगे । कोई कहता ये काम करो हम झट उत्तर देते कि अभी तो जम छोटे हैं , बड़ा […]

कविता

न वो बदले हैं , न हम बदले है …!!

न वो बदले हैं , न हम बदले है , बस हमारे बीच अब बदले हैं।   सच की दहलीज़ पर यूँ बैठे हैं , कि मानो हकीकत में कई परदे हैं।   नाउम्मीदगी का कोई निशां नहीं , फिर भी निराशा की जंजीरों में हम जकड़े हैं।   गुलामी का सबब याद है, फिर क्यों खुद से हम खुद जकड़े […]